दिवाकर कुमार
झारखंड में इन दिनों छात्र आंदोलन चल रहा है। दूर से देखने पर यह शायद एक और आंदोलन लगे। लेकिन मेरे लिए यह सिर्फ एक आंदोलन नहीं है। इसमें मुझे एक उम्मीद दिखाई दे रही है—एक ऐसी उम्मीद, जो शायद पिछले कई वर्षों में धीरे-धीरे कमजोर होती गई थी।
झारखंड बने हुए 25 साल हो गए हैं। इन 25 वर्षों में सरकारें बदलीं, मुख्यमंत्री बदले, राजनीतिक समीकरण बदले। बहुत कुछ बदला और कुछ चीजें निश्चित रूप से बेहतर भी हुईं। लेकिन एक चीज शायद लगातार बनी रही—लोगों का असंतोष और व्यवस्था पर कम होता भरोसा।
आज झारखंड का एक आम युवा खुद से पूछता है—भरोसा करें तो किस पर करें?
केंद्र की सरकार अपनी नहीं लगती, राज्य की सरकार अपनी नहीं लगती। राजनीतिक दल अपने-अपने हिसाब से बातें करते हैं। चुनाव आते हैं तो युवाओं और रोजगार की बातें होती हैं। लेकिन जब वही युवा सालों तक परीक्षा की तैयारी करता है और फिर परीक्षा समय पर नहीं होती, परिणाम नहीं आता, पेपर लीक हो जाता है या भर्ती प्रक्रिया किसी न किसी कारण से अटक जाती है, तब उसकी परेशानी को समझने वाला कौन होता है?
मैं यह बात इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि मैं उस दौर से गुजर चुका हूँ। 15 नवंबर 2000 का दिन आज भी मुझे याद है। झारखंड के गठन का वह दिन हमारे लिए बहुत खास था। राजभवन में राज्य गठन के समारोह में शामिल होने का अवसर मिला था। उस समय मन में बहुत सारी उम्मीदें थीं।
मुझे लगा था कि अब अपना राज्य है। यहां रहकर, यहीं काम करके, यहीं अपनी क्षमता का इस्तेमाल करके हम कुछ बड़ा कर सकते हैं। इसी उम्मीद के साथ मैंने दिल्ली छोड़कर झारखंड वापस आने का फैसला किया। मैं अकेला नहीं था। मेरे जैसे बहुत से लोग थे, जो नए झारखंड के सपने के साथ वापस आए थे।
मैंने भी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी की। तीन बार प्रारंभिक परीक्षा पास की। लेकिन परीक्षा कब होगी, इसका कोई निश्चित कैलेंडर नहीं था। कभी परीक्षा आगे बढ़ती, कभी प्रक्रिया रुक जाती।
और फिर वही था—इंतजार। इंतजार परीक्षा का। इंतजार परिणाम का। इंतजार अगली भर्ती का। और धीरे-धीरे इंतजार करते-करते उम्र निकलती जाती है।
आज जब मैं झारखंड के उन बच्चों को देखता हूं, जो 15-16 घंटे पढ़ाई करते हैं, छोटी-छोटी जगहों में रहकर तैयारी करते हैं, परिवार से दूर रहते हैं और अपनी पूरी जवानी एक सरकारी नौकरी की उम्मीद में लगा देते हैं, तो मैं उनकी परेशानी समझ सकता हूं। क्योंकि वह जिंदगी मैंने खुद जी है। उन बच्चों के पीछे सिर्फ एक छात्र नहीं होता। उसके पीछे पूरा परिवार होता है। एक मां होती है, जो अपने बच्चे के लिए अपनी जरूरतें रोक देती है। एक पिता होता है, जो यह सपना देखता है कि उसका बेटा या बेटी एक दिन अपने पैरों पर खड़ा होगा। भाई-बहन होते हैं, जो उम्मीद लगाए बैठे होते हैं। मेरे पिता की भी यही उम्मीद थी। वे चाहते थे कि मैं एक दिन अधिकारी बनूं। आज वे हमारे बीच नहीं हैं। लेकिन उनकी वह उम्मीद आज भी मेरे साथ है। इसलिए जब एक प्रश्नपत्र लीक होता है, तो सिर्फ एक परीक्षा रद्द नहीं होती। उसके साथ हजारों परिवारों की उम्मीदें हिल जाती हैं।
किसी बच्चे की दो साल की मेहनत खत्म हो जाती है। किसी की उम्र निकल जाती है। किसी को फिर से शुरुआत करनी पड़ती है। और कई बार कोई युवा पूरी तरह टूट जाता है। हम अक्सर कहते हैं—"पेपर लीक हो गया, फिर से परीक्षा हो जाएगी।" लेकिन हमें यह समझना होगा कि उस एक वाक्य के पीछे किसी की जिंदगी के दो-तीन साल हो सकते हैं। किसी मां-बाप की जमा पूंजी हो सकती है। किसी बच्चे का पूरा भविष्य हो सकता है। और सबसे बड़ी बात—व्यवस्था पर उसका भरोसा हो सकता है। शायद इसी भरोसे की लड़ाई आज झारखंड के छात्र लड़ रहे हैं।
यह लड़ाई केवल JPSC की नहीं है। यह केवल किसी एक परीक्षा की नहीं है। यह केवल किसी एक सरकार की भी नहीं है। जब मैंने परीक्षा दी थी, उस समय राज्य में दूसरी सरकार थी। आज दूसरी सरकार है। कल कोई और सरकार हो सकती है। इसलिए हमें यह सवाल किसी एक पार्टी से नहीं, पूरी व्यवस्था से पूछना होगा। आखिर ऐसा क्यों है कि हमारे बच्चों को अपनी ही सरकार और अपनी ही व्यवस्था पर भरोसा नहीं होता?
आखिर क्यों हमारे राज्य के अच्छे बच्चे पढ़ाई पूरी करके बाहर चले जाते हैं? क्यों माता-पिता सोचते हैं कि अगर बच्चे को अच्छी पढ़ाई देनी है तो उसे झारखंड से बाहर भेजना होगा? क्यों एक युवा यह सोचने लगता है कि यहां रहकर मेहनत करने से बेहतर है कि किसी दूसरे राज्य में जाकर नौकरी कर ली जाए? और सबसे दुखद बात यह है कि धीरे-धीरे हमने इसे सामान्य मान लिया है। हम कहते हैं—"यहां तो ऐसा ही होता है।" यही सोच सबसे खतरनाक है। पेपर लीक होना सामान्य नहीं है। परीक्षा का वर्षों तक इंतजार करना सामान्य नहीं है। योग्य युवाओं का अवसर से वंचित रहना सामान्य नहीं है। और सरकार से सवाल पूछने वाले युवाओं को गलत समझना भी सामान्य नहीं होना चाहिए।
मुझे इस आंदोलन में इसलिए उम्मीद दिखाई दे रही है क्योंकि इस बार युवा खुद अपनी बात कह रहे हैं। लेकिन एक बात बहुत जरूरी है। इस आंदोलन को राजनीति का हथियार नहीं बनने देना चाहिए। जो लोग छात्रों की आवाज को अपने राजनीतिक फायदे के लिए इस्तेमाल करना चाहते हैं, उनसे छात्रों को सावधान रहना होगा। जो आंदोलन को बदनाम करना चाहते हैं, उनसे भी सावधान रहना होगा। और जो इस आंदोलन के नाम पर अपना व्यक्तिगत फायदा देख रहे हैं, उन्हें भी पहचानना होगा। क्योंकि आंदोलन छात्रों का है। उनकी मेहनत का है। उनके भविष्य का है। उन्हें किसी राजनीतिक दल का मोहरा नहीं बनना चाहिए। हम सभी की जिम्मेदारी है कि हम छात्रों का मनोबल बढ़ाएं। उनकी बात सुनें। उनके साथ खड़े हों। लेकिन उन्हें सही दिशा में आगे बढ़ने में भी मदद करें।
यह आंदोलन शांतिपूर्ण रहे। लोकतांत्रिक रहे। किसी व्यक्ति या पार्टी के खिलाफ नफरत का आंदोलन न बने। बल्कि यह व्यवस्था को बेहतर बनाने का आंदोलन बने। आज देश और दुनिया तेजी से बदल रही है। AI आ गया है। सोशल मीडिया हमारे जीवन का हिस्सा बन चुका है। एक खबर कुछ ही मिनटों में लाखों लोगों तक पहुंच सकती है। लेकिन इसी के साथ एक खतरा भी बढ़ गया है। अब सच और झूठ के बीच अंतर करना मुश्किल होता जा रहा है। AI के माध्यम से ऐसी तस्वीरें, वीडियो और खबरें बनाई जा सकती हैं, जो देखने में बिल्कुल सच लगें लेकिन हों नहीं। इसका सबसे ज्यादा नुकसान आम आदमी और युवा को हो सकता है। इसलिए हमें केवल सरकारों से नहीं, खुद से भी सवाल करना होगा।
हमें सही जानकारी चाहिए। हमें सवाल पूछने की आदत चाहिए। हमें बिना जांचे किसी खबर पर विश्वास नहीं करना चाहिए। और सबसे जरूरी—हमें अपने युवाओं पर भरोसा करना होगा। किसी भी राज्य की सबसे बड़ी ताकत उसकी जमीन, जंगल, खनिज या उद्योग नहीं होते। उसकी सबसे बड़ी ताकत उसके युवा होते हैं। अगर हमारे अच्छे बच्चे निराश हो गए, अगर वे व्यवस्था पर भरोसा खो बैठे, अगर उन्हें लगे कि मेहनत का कोई मतलब नहीं है, तो यह सिर्फ उनका नुकसान नहीं होगा। यह झारखंड का नुकसान होगा। यह देश का नुकसान होगा। इसलिए झारखंड के इस छात्र आंदोलन को मैं एक अवसर की तरह देखता हूं। एक ऐसा अवसर, जिसमें हम अपनी व्यवस्था को फिर से देखने की कोशिश कर सकते हैं। जरूरी नहीं कि हर समस्या का समाधान सरकार बदलने से हो।
नई व्यवस्था का मतलब हमेशा नई सरकार नहीं होता। सरकार वही रह सकती है। राजनीतिक दल वही रह सकते हैं। लेकिन काम करने का तरीका बदलना चाहिए। भर्ती प्रक्रिया समय पर हो। परीक्षाओं का निश्चित कैलेंडर हो। पेपर लीक जैसी घटनाओं पर सख्त कार्रवाई हो। युवाओं को अपनी मेहनत पर भरोसा हो। सरकार और युवाओं के बीच संवाद हो। और सबसे जरूरी—सरकार को यह समझना होगा कि एक छात्र सिर्फ एक संख्या नहीं है। वह किसी परिवार की उम्मीद है। वह झारखंड का भविष्य है। वह देश की ताकत है। मेरी झारखंड के छात्र आंदोलन में शामिल सभी युवाओं को दिल से सलाम है।
मैं चाहता हूं कि वे अपनी आवाज को मजबूती से उठाते रहें, लेकिन अपनी निस्वार्थ भावना को बनाए रखें। किसी के बहकावे में न आएं। किसी राजनीतिक स्वार्थ का हिस्सा न बनें। और हम जैसे लोगों की भी जिम्मेदारी है कि हम उन्हें सिर्फ सोशल मीडिया पर समर्थन देने तक सीमित न रहें। जहां संभव हो, जिस तरीके से संभव हो, उनका साथ दें। क्योंकि यह लड़ाई सिर्फ आज की परीक्षा की नहीं है। यह आने वाली पीढ़ी के भरोसे की लड़ाई है। शायद झारखंड का यह आंदोलन हमें एक बार फिर याद दिला रहा है कि बदलाव सिर्फ सरकारों से नहीं आता। बदलाव तब आता है जब समाज सवाल पूछता है। जब युवा अपने अधिकार के लिए खड़ा होता है। जब व्यवस्था अपनी गलती स्वीकार करती है। और जब हम सब मिलकर यह तय करते हैं कि— अब बहुत हो गया।
अब ऐसा झारखंड चाहिए जहां बच्चे सपने देखने से डरें नहीं। जहां मेहनत करने वाला युवा अपनी मेहनत पर भरोसा कर सके। जहां नौकरी पाने के लिए किसी सिफारिश या जुगाड़ की नहीं, अपनी योग्यता की जरूरत हो।
जहां सरकार से सवाल पूछना विरोध नहीं, लोकतंत्र का हिस्सा माना जाए। और जहां विकास का मतलब सिर्फ सड़क, भवन और आंकड़े नहीं, बल्कि लोगों के जीवन में भरोसा और उम्मीद लौटना भी हो।
झारखंड के छात्रों की यह आवाज सिर्फ झारखंड तक सीमित न रहे। यह आवाज देश के हर उस युवा तक पहुंचे जो व्यवस्था से निराश है। लेकिन यह आवाज शांति की हो, बदलाव की हो और बेहतर भविष्य की हो। क्योंकि झारखंड को सिर्फ नई सरकार नहीं, एक नई सोच और एक बेहतर व्यवस्था की जरूरत है। और शायद इस बार उम्मीद की वह किरण हमारे युवाओं के हाथ में है।
