सुधाकर
झारखंड राज्य गठन के 25 वर्षों के इतिहास को उठाकर देखें तो जेपीएससी (झारखंड लोक सेवा आयोग) और जेएसएससी (झारखंड कर्मचारी चयन आयोग) में परीक्षाओं को लेकर उठने वाले सवाल या कथित अनियमितताएं कोई नई बात नहीं हैं। राज्य गठन के शुरुआती वर्षों से ही नियुक्ति प्रक्रियाओं में गड़बड़ियों के आरोप लगते रहे हैं, जिसकी गवाही पूर्ववर्ती सरकारों के दौर में हुई जांच, अखबारों की सुर्खियां और सीबीआई की चार्जशीट तक देती हैं।
इस पृष्ठभूमि के बीच हेमंत सोरेन सरकार का हालिया रुख राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था में एक बड़े बदलाव का संकेत देता है। "हेमंत है तो हिम्मत है" का नारा सिर्फ एक राजनीतिक संवाद नहीं, बल्कि पुरानी व्यवस्था से टकराने और व्यवस्थागत सुधार को लागू करने के राजनीतिक साहस को दर्शाता है।
राज्य के इतिहास में अक्सर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का दौर चलता रहा है, लेकिन किसी भी सरकार में प्रशासनिक स्तर पर फैले इस जाल को जड़ से मिटाने की वैसी मंशा नहीं दिखी जो आज दिख रही है।
पिछली सरकारों के दौरान हुए कई मामलों की जांच केंद्रीय एजेंसी सीबीआई तक पहुंची, लेकिन वर्तमान परिदृश्य में सत्ता के शीर्ष नेतृत्व या सोरेन परिवार पर इन भर्ती प्रक्रियों के किसी लाभुक के रूप में नाम सामने नहीं आया है।
मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने खुले तौर पर यह स्वीकार किया है कि केवल जेपीएससी ही नहीं, बल्कि जेएसएससी की परीक्षाओं में भी गड़बड़ी हुई है और दोषियों पर कड़ी कार्रवाई करते हुए उन्हें जेल भेजा जा रहा है। यह स्वीकारोक्ति खुद अपनी ही व्यवस्था को सुधारने की दिशा में एक पहला और अनिवार्य कदम है।
छात्रों के बीच सीबीआई जांच की मांग और सरकार द्वारा सीआईडी/एसआईटी को प्राथमिकता दिए जाने पर अक्सर राजनीति हावी हो जाती है।
राज्य की सीआईडी और एसआईटी ने हालिया मामलों में कई नेटवर्क को बेनकाब किया है, जिससे यह साफ होता है कि राज्य की जांच एजेंसियां त्वरित और कंक्रीट नतीजे देने में सक्षम हैं।साथ ही न्यायिक जांच कराने का फैसला स्वागतयोग्य है।
जब परीक्षाओं और नियुक्तियों के मुद्दे पर विशुद्ध राजनीति शुरू हो जाती है, तो सबसे ज्यादा नुकसान उन लाखों अभ्यर्थियों का होता है जो वर्षों से तैयारी कर रहे हैं।
झारखंड में नियुक्ति प्रणाली को दशकों पुराने 'सिंडिकेट खेल' से मुक्त कराना एक दिन का काम नहीं है। लेकिन,अगर मुख्यमंत्री डंके की चोट पर यह बात कह रहे हैं कि प्रणाली में सुधार होगा और दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा, तो यह युवाओं और पारदर्शी शासन के लिए एक सकारात्मक कदम है। राजनीति से परे हटकर, व्यवस्था में इस ऐतिहासिक सुधार की मुहिम का स्वागत किया जाना चाहिए ताकि झारखंड के योग्य युवाओं को उनका सही हक मिल सके।
