अमित झा
रांची। राज्य में जन और प्रशासनिक तंत्र के बीच संवादहीनता लगातार गहरी होती जा रही है। आलम यह है कि आम जनता तो दूर, जनप्रतिनिधियों के पत्रों का जवाब देने और उनके फोन उठाने तक में अधिकारी परहेज कर रहे हैं। इस गंभीर स्थिति को देखते हुए संसदीय कार्य मंत्री राधा कृष्ण किशोर ने गहरी चिंता जताई है। उन्होंने विधानसभा स्पीकर को पत्र भेजकर विधायकों के विशेषाधिकार का दायरा बढ़ाने और कार्य संचालन नियमावली में संशोधन की मांग उठाई है। मंत्री का तर्क है कि सदन में जनप्रतिनिधियों द्वारा उठाए गए मुद्दों को अफसर जानबूझकर टालते हैं, जिसे विशेषाधिकार हनन की श्रेणी में लाया जाना चाहिए।
अधिकारी दे रहे गोलमटोल और झूठी जानकारियां: सरयू
जदयू विधायक सरयू राय ने मंत्री राधा कृष्ण किशोर की इस पहल का समर्थन किया है। उन्होंने कहा कि अधिकारियों का यह रवैया नया नहीं है; पहले वे गोलमटोल जवाब देकर पल्ला झाड़ लेते थे, लेकिन अब गलत और झूठी जानकारियां तक उपलब्ध कराने लगे हैं। यह प्रवृत्ति अधिकारियों की मंशा पर सीधे सवाल खड़े करती है।
6 साल बाद सूचना आयुक्तों की नियुक्ति
दूसरी ओर, पारदर्शिता का दावा करने वाला 'सूचना का अधिकार' (आरटीआई) कानून भी तंत्र की लापरवाही की बलि चढ़ रहा है। करीब 6 सालों के लंबे अंतराल के बाद राज्य सूचना आयोग सक्रिय तो हुआ, लेकिन लोगों को सूचनाएं अब भी नहीं मिल पा रही हैं। आरटीआई एक्टिविस्ट आनंद कुमार पंडा के अनुसार, मई 2019 तक सूचना आयोग में उनकी द्वितीय अपील के 99 मामले लंबित थे। पिछले 6 वर्षों में उनके अकेले के 300 नए मामले सामने आए, जिससे केवल उनके ही कुल मामलों की संख्या 400 तक पहुंच गई है। पिछले दो महीनों में भी लगातार नए केस दर्ज हुए हैं। उनका कहना है कि आयोग के पुनर्गठन के बावजूद अधिकारियों के स्तर पर टालमटोल का रवैया बरकरार है और आम जनता को सूचनाओं के लिए भटकना पड़ रहा है।
