सुधाकर

​झारखंड इन दिनों एक बार फिर परीक्षाओं में धांधली, पेपर लीक और नियुक्ति प्रक्रिया में गड़बड़ियों को लेकर सुलग रहा है। झारखंड लोक सेवा आयोग (जेपीएससी) और झारखंड कर्मचारी चयन आयोग (जेएसएससी) की कार्यप्रणाली के खिलाफ सड़कों पर छात्रों का आक्रोश चरम पर है। मुख्य विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) सड़कों से लेकर संसद तक सरकार को घेर रही है। हालाँकि, इस राजनीतिक घमासान और दिल्ली के 'जेन जी' आंदोलनों के बाद की बदलती राजनीतिक परिस्थितियों के बीच, सबसे बड़ा सवाल झारखंड के युवाओं के भविष्य का है।

​सत्ता बनाम विपक्ष: प्रतिशोध और सियासत का खेल

​विपक्ष का यह अधिकार और कर्तव्य दोनों है कि वह छात्रों की आवाज़ को बुलंद करे। लेकिन झारखंड की मौजूदा राजनीति को अगर गहराई से देखा जाए, तो जेपीएससी और जेएससी को लेकर जारी राजनीतिक बयानबाज़ी महज चुनावी या तात्कालिक फायदा उठाने की होड़ भी नज़र आती है। एक तरफ जहाँ केंद्र और राज्यों के बीच राजनीतिक शह-मात का खेल (जैसे दिल्ली में आंदोलनों के बाद केंद्र का बैकफुट पर आना) चल रहा है, वहीं दूसरी तरफ झारखंड में विपक्षी दल इस असंतोष को भुनाने में लगे हैं। लेकिन,सवाल यह है कि क्या इस सियासत में छात्रों के वास्तविक हित शामिल हैं या यह सिर्फ राजनीतिक हिसाब-किताब चुकता करने का जरिया है?

​अतीत के पन्ने: नींव ही जब गड़बड़ी पर रखी गई

​झारखंड गठन के बाद राज्य के युवाओं को उम्मीद थी कि अलग राज्य बनने से उन्हें अपने ही प्रदेश में पारदर्शी तरीके से रोज़गार मिलेगा। राज्य बनने के बाद भाजपा नेतृत्व वाली सरकारें लंबे समय तक सत्ता में रहीं, लेकिन जेपीएससी की शुरुआत ही विवादों से हुई।

​प्रथम और द्वितीय जेपीएससी परीक्षाओं में जिस तरह के गड़बड़झाले की बातें सामने आईं, उसने इस संस्था की साख पर शुरुआती दौर में ही सवालिया निशान लगा दिए थे। प्रभावशाली नेताओं, नौकरशाहों और रसूखदारों के करीबियों और रिश्तेदारों को नियम-कायदों को ताक पर रखकर नौकरियाँ बाँटने के आरोप लगे। मेरिट को दरकिनार कर भ्रष्टाचार की जो नींव उस समय पड़ी, बाद में आने वाली लगभग सभी सरकारों के कार्यकाल में वह प्रथा किसी न किसी रूप में जारी रही।

​सीबीआई जाँच की ढीली रफ्तार और रिटायरमेंट की दहलीज पर गड़बड़ियाँ

​जेपीएससी में हुए घोटालों की सीबीआई जाँच एक लंबा इतिहास बन चुकी है। विडंबना देखिए कि जिन नियुक्तियों में धांधली और भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगे, उनकी जाँच इतनी लंबी खिंच गई कि गलत तरीके से व्यवस्था में घुसे कई लोग अब अपनी सेवा पूरी कर सेवानिवृत्ति (रिटायरमेंट) के मुहाने पर खड़े हैं।

​जाँच एजेंसियों की इस धीमी गति का खामियाजा उन योग्य अभ्यर्थियों ने भुगता जो सिस्टम के बाहर ही रह गए और भ्रष्टाचार के बल पर अंदर आए लोग सालों तक सरकारी सुविधाओं और पदों का आनंद लेते रहे। यह न केवल न्याय प्रणाली पर सवाल उठाता है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि राजनैतिक इच्छाशक्ति के अभाव में जाँच एजेंसियां भी बेअसर साबित होती हैं।

​सबसे बड़ा नुकसान: 30-35 सालों का 'जेनरेशनल लॉस'

​भ्रष्टाचार का असर केवल किसी एक परीक्षा या कुछ चुनिंदा पदों तक सीमित नहीं रहता। जब फर्जी या अयोग्य तरीके से शिक्षक, व्याख्याता, पुलिस अधिकारी और प्रशासनिक अफसर बहाल होते हैं, तो इसका सबसे गंभीर प्रहार राज्य के सामाजिक और शैक्षणिक ढाँचे पर पड़ता है।

​शिक्षा का ह्रास: अयोग्य शिक्षकों और प्रोफेसरों की नियुक्ति ने राज्य की कम से कम दो से तीन पीढ़ियों (30 से 35 साल) के भविष्य को प्रभावित किया है। जो खुद योग्य नहीं हैं, वे आने वाली पीढ़ी को क्या मार्गदर्शन देंगे?

​प्रशासनिक लाचारी: जब प्रशासनिक पदों पर गलत लोग बैठते हैं, तो पूरी व्यवस्था में भाई-भतीजावाद और रिश्वतखोरी को बढ़ावा मिलता है, जिसका सीधा असर आम जनता पर पड़ता है।

​झारखंड में चाहे भाजपा का शासन रहा हो या झामुमो/कांग्रेस का,जेपीएससी और जेएससी जैसी संस्थाओं की विश्वसनीयता बहाल करने में हर सरकार नाकाम रही है। आज अगर छात्र सड़कों पर हैं, तो उनका गुस्सा केवल किसी एक राजनीतिक दल के खिलाफ नहीं, बल्कि पूरे 'सिस्टम' के खिलाफ है।

​अगर झारखंड को वाकई एक सशक्त राज्य बनाना है,तो राजनीतिक दलों को आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति से ऊपर उठकर पारदर्शी नीति बनानी होगी। सीबीआई जाँचों को समयबद्ध पूरा करना होगा और भविष्य की सभी परीक्षाओं के लिए कड़े एवं निष्पक्ष नियम लागू करने होंगे। वरना, नेताओं की राजनीतिक रोटियाँ तो सिकती रहेंगी, लेकिन राज्य की भावी पीढ़ियों का भविष्य यूँ ही अंधकार में डूबता रहेगा।