रांची। 18 जुलाई को झारखंड राज्य के सूचना आयुक्त शिवपूजन पाठक द्वारा रामगढ़ परिसदन में और सूचना आयुक्त तनुज खत्री द्वारा 23 जुलाई को रांची विश्वविद्यालय में सूचना का अधिकार (RTI) से संबंधित समीक्षा बैठकें आयोजित की गईं। इन आयोजनों के बाद प्रशासनिक, कानूनी और राजनीतिक गलियारों में यह बहस छिड़ गई है कि क्या सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 सूचना आयुक्तों को इस तरह की प्रत्यक्ष समीक्षा बैठकें या प्रशासनिक निरीक्षण करने की अनुमति देता है?

इसके साथ ही एक बड़ा प्रश्न यह भी उठ रहा है कि क्या इन अनधिकृत समीक्षा बैठकों के पीछे केवल RTI के प्रति जागरूकता बढ़ाना उद्देश्य है, या इसके पीछे कोई निहित स्वार्थ छुपा है?

1. RTI अधिनियम, 2005 में निहित वैधानिक स्थिति एवं शक्तियां

RTI अधिनियम, 2005 का सूक्ष्म अध्ययन करने पर स्पष्ट होता है कि राज्य सूचना आयोग और उसके आयुक्तों की भूमिका मुख्य रूप से अर्ध-न्यायिक (Quasi-Judicial) है, न कि प्रशासनिक।

अपीलीय और अर्ध-न्यायिक निकाय: आयोग का प्राथमिक कार्य धारा 18 (शिकायतें) और धारा 19 (द्वितीय अपील) के तहत नागरिकों की अर्जियों पर सुनवाई करना है। आयोग एक न्यायालय की तरह काम करता है, जो सूचना न देने वाले लोक सूचना अधिकारियों (PIO) पर जुर्माना लगा सकता है या सूचना उपलब्ध कराने का आदेश दे सकता है।

दस्तावेज़ मंगवाने की शक्ति (धारा 18, 19 एवं 25): आयोग को किसी भी लोक प्राधिकरण (Public Authority) के अधिकारियों को अपने समक्ष समन करने, साक्ष्य लेने या रिकॉर्ड मंगवाने का अधिकार है। धारा 25 के तहत आयोग अपनी वार्षिक रिपोर्ट तैयार करने हेतु विभागों से डेटा मांग सकता है।

अधिकारों की सीमा: अधिनियम में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जो आयुक्तों को सरकारी दफ्तरों, विश्वविद्यालयों या परिसदनों में जाकर व्यक्तिगत रूप से 'ऑन-द-स्पॉट' प्रशासनिक समीक्षा या निरीक्षण करने का अधिकार देता हो।

2. परिसदन या विश्वविद्यालयों में समीक्षा बैठकों का औचित्य

RTI अधिनियम के तहत किसी लोक प्राधिकरण के कार्यालय या विश्वविद्यालय परिसर में जाकर आधिकारिक समीक्षा बैठक आयोजित करने के वैधानिक पहलू निम्नलिखित हैं:

सीधे निरीक्षण का वैधानिक अभाव: आयोग एक अपीलीय प्राधिकार है, न कि किसी विभाग का प्रशासनिक नियंत्रक। कार्यपालिका (Executive) के कामकाज की निगरानी करना राज्य सरकार या विभागाध्यक्षों का काम है, सूचना आयोग का नहीं।

क्षेत्राधिकार से बाहर का कदम: जब कोई आयुक्त अपने आधिकारिक मुख्यालय या पीठ (Bench) से बाहर जाकर किसी विभाग या विश्वविद्यालय की समीक्षा बैठक लेता है, तो वह अपने कानूनी क्षेत्राधिकार (Jurisdiction) का उल्लंघन करता है।

यह सवाल प्रशासनिक पारदर्शिता और शुचिता के लिहाज से बेहद गंभीर है। जब कोई अर्ध-न्यायिक प्राधिकारी अपने तय दायरे से बाहर जाकर सीधे प्रशासनिक अधिकारियों पर दबाव या प्रभाव बनाने का प्रयास करता है, तो संभावित स्वार्थों या आशंकाओं को नकारा नहीं जा सकता।

न्याय का यह सर्वमान्य सिद्धांत है कि "Justice must not only be done, but must also be seen to be done" (न्याय न केवल होना चाहिए, बल्कि होता हुआ दिखना भी चाहिए)। जब अर्ध-न्यायिक भूमिका वाले सूचना आयुक्त अपनी पीठ (Bench) छोड़कर सीधे विभागों की प्रशासनिक समीक्षा करने लगते हैं, तो इससे न केवल कानून के उल्लंघन का प्रश्न खड़ा होता है, बल्कि उनके निष्पक्ष चरित्र पर भी 'निहित स्वार्थ' और 'शक्ति के प्रदर्शन' के गंभीर सवाल उठते हैं। आयोग की वास्तविक शक्ति और विश्वसनीयता अपने प्रांगण में बैठकर निष्पक्षता से लंबित अपीलों के निस्तारण में है, न कि सरकारी दफ्तरों के प्रशासनिक मामलों में हस्तक्षेप करने में।