मधुकर भारद्वाज
पहली बार विधानसभा का सदस्य निर्वाचित होकर बहुत ही कम समय में अपनी एक विशिष्ट पहचान बना लेना आसान नहीं होता, विशेषकर झारखंड विधानसभा जैसे गतिशील राजनीतिक मंच पर। लेकिन 1970 में जन्में सुदीव्य सोनू ने इस राह को अत्यंत सहजता से तय किया। वर्ष 2019 में जब वे झारखंड विधानसभा के सदस्य निर्वाचित हुए, तब तक वे वर्षों तक पार्टी के एक समर्पित कार्यकर्ता के रूप में अपनी सेवा दे चुके थे। जिस निष्ठा से उन्होंने पार्टी संगठन में काम किया, उसी गंभीरता और लगन से उन्होंने अपने 5 वर्षों के विधायक कार्यकाल के दौरान संसदीय व्यवस्थाओं, परंपराओं और विधान सभा की बारीकियों को समझने में खुद को समर्पित कर दिया।
सरकार पर जब भी कोई संकट गहराया,चाहे वह सदन के अंदर हो या बाहर सुदीव्य सोनू हमेशा एक कुशल संकटमोचक के रूप में सामने आए। घटक दलों से संवाद साधना हो, अपनी मांगों को लेकर मुखर आंगनबाड़ी सेविकाओं व शिक्षकों को आश्वस्त करना हो, या फिर हाल के दिनों में उग्र आंदोलनरत छात्रों से बात करनी हो—सरकार और पार्टी दोनों का भरोसा सदैव एक ही नाम पर आकर टिकता था, वह था सुदीव्य सोनू।
उनके इस कौशल का मूल आधार था उनके मन में लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के प्रति गहरा सम्मान। पार्टी के पक्ष को पूरी मजबूती से रखना, राजनीतिक परिवेश की नब्ज पहचानना और साथ ही सामने वाले के दृष्टिकोण को सहानुभूतिपूर्वक समझना—ये सभी गुण उनमें रचे-बसे थे। यही कारण था कि सदन के भीतर और बाहर, हर जगह उनकी पहचान एक अत्यंत शांत, शालीन, गंभीर और सुलझे हुए व्यक्तित्व के रूप में बनी।
सदन के भीतर वे हमेशा बेहद सक्रिय और सजग रहते थे। जब भी उन्हें यह आभास होता कि सत्ता पक्ष के सदस्यों की उपस्थिति कम है, वे स्वयं आगे बढ़कर स्थिति संभालते थे। वे इस बात से अच्छी तरह वाकिफ थे कि संसदीय प्रक्रिया में कभी भी ऐसा अवसर आ सकता है जब मत-विभाजन की नौबत आ जाए और सरकार के प्रस्तावों को पूर्ण समर्थन की आवश्यकता पड़े। विपक्षी दलों के तीखे और तल्ख सवालों का जवाब देने के लिए वे चाहे एक सदस्य के रूप में प्रस्तुत हों या एक मंत्री के रूप में, हमेशा पूरी तैयारी और पुख्ता तथ्यों के साथ सदन में आते थे। विधेयकों पर चर्चा हो, बजट को स्वीकृति दिलानी हो या कोई अन्य सरकारी प्रस्ताव पास कराना हो—सदन की रणनीति तय करने और उसे सफलतापूर्वक पारित कराने का दायित्व अक्सर सुदीव्य सोनू के मजबूत कंधों पर ही होता था।
2019 से 2024 के दौरान वे लोक लेखा समिति (पीएसी) के भी प्रमुख सदस्य रहे। समिति की बैठकों में वे अक्सर इस बात को लेकर चिंतित दिखते थे कि एक ही प्रकार की वित्तीय अनियमितताएँ वर्षों से लगातार कैसे दोहराई जा रही हैं। वे केवल औपचारिकता के पक्षधर नहीं थे, बल्कि सदैव समस्याओं के ठोस और स्थायी निदान पर जोर देते थे। हाल ही में हुए छात्र आंदोलन को उन्होंने जिस तरह से लगभग विवाद-रहित सुलझाया, वह उनकी प्रशासनिक और राजनीतिक परिपक्वता का उदाहरण था। इस दौरान कानूनी पक्षों की मर्यादा रखते हुए राजनीतिक और मानवीय दृष्टिकोण को संतुलित करना उनकी कार्यशैली का उत्कृष्ट उदाहरण था।
एक जनप्रतिनिधि के रूप में उनका सबसे बड़ा गुण था—सुनने और संवाद स्थापित करने की अद्भुत क्षमता। वे अपने अधिकारियों और आम लोगों को हमेशा पूरे धैर्य के साथ सुनते थे। लगभग सात वर्षों के संसदीय जीवन में कभी ऐसा दृश्य देखने को नहीं मिला कि उन्होंने विधानसभा अध्यक्ष की अनुमति के बिना बोलने का प्रयास किया हो। वे सदैव अपनी बारी और आसन के निर्देशों का सम्मान करते थे। सत्ता पक्ष को विपक्ष के तीखे राजनीतिक या संसदीय हमलों का मुकाबला किस प्रकार करना है, इसकी रणनीति बनाने वाले अग्रिम पंक्ति के नीतिगत सहयोगियों में वे सदैव प्रथम थे।
आज जब वे हमारे बीच नहीं हैं, तो सदन की कार्यवाही हो या सदन के बाहर का राजनीतिक परिदृश्य—सुदीव्य सोनू की अनुपस्थिति और उनकी वह सहज, शालीन मुस्कान हमेशा खलेगी। उनका जीवन संसदीय गरिमा और लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति समर्पण का एक अमिट संस्मरण बनकर हमारे बीच अमर रहेगा।
(लेखक झारखंड विधानसभा के सेवानिवृत संयुक्त सचिव हैं)
