​रांची। झारखंड विधानसभा में वित्त मंत्री राधा कृष्ण किशोर द्वारा पेश की गई नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) की ताजा रिपोर्ट में राज्य के विभिन्न विभागों और विकास योजनाओं में व्यापक अनियमितताओं, प्रशासनिक लापरवाही और वित्तीय कुप्रबंधन का खुलासा हुआ है। रिपोर्ट के अनुसार योजनाओं के नाम पर करोड़ों रुपये पानी की तरह बहाए गए, लेकिन धरातल पर परिणाम नगण्य रहे।

​मनरेगा: 2,633रु. करोड़ खर्च के बाद भी 50 लाख कार्य अधूरे

​सीएजी ऑडिट (वर्ष 2019-24) के अनुसार, महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) राज्य में घोर प्रशासनिक लापरवाही का शिकार है। वर्ष 2019-24 के दौरान प्रस्तावित कुल 1,02,68,484 कार्यों में से केवल 27,96,044 (27%) कार्य ही पूरे हो सके।

योजना की गाइडलाइंस को दरकिनार कर बिना बॉटम-अप अप्रोच और बिना घर-घर जाकर मांग का आकलन किए सिर्फ बजटीय आधार पर कागजी आँकड़े तैयार किए गए।

​राज्य सरकार द्वारा 40 से 55 दिनों की देरी से फंड जारी करने के कारण मार्च 2025 तक अकुशल श्रमिकों की 321.84 करोड़ की मजदूरी बकाया पाई गई।

​जिला परिप्रेक्ष्य योजनाएँ तैयार करने और ग्राम पंचायत स्तर पर जॉब कार्ड जारी/अपडेट करने में पारदर्शिता नहीं बरती गई।

​जल जीवन मिशन: योजनाओं का केवल 28% काम पूरा

​अगस्त 2019 में शुरू हुई 'जल जीवन मिशन' योजना कुप्रबंधन और भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गई है। राज्य सरकार ने 24,360.91 करोड़ की योजनाएं मंजूर कीं, लेकिन फंड की कमी और कुप्रबंधन के चलते दिसंबर 2024 तक मात्र 28% योजनाएं ही पूरी हो सकीं।

​ठेकेदारों को अनुचित लाभ पहुंचाने के लिए निविदा जमा करने की अवधि घटाकर केवल 5 से 22 दिन रखी गई, जिससे निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा सीमित हो गई।

क्षमता से अधिक काम सौंपने के साथ-साथ संवेदकों को 27.13 करोड़ की अनुचित वित्तीय सहायता दी गई।

​राजस्व व अन्य विभागों में 4,300 करोड़ से अधिक का नुकसान

​राज्य के चार प्रमुख विभागों वाणिज्य कर, परिवहन, उत्पाद एवं मद्य निषेध, और राजस्व निबंधन में लचर कार्यप्रणाली के कारण सरकारी खजाने को भारी क्षति पहुंची है। रिपोर्ट में शामिल अनियमितताओं का कुल वित्तीय प्रभाव 4,324.44 करोड़ आंका गया है।

सरकार ने इसमें से 859.43 करोड़ की गड़बड़ियों को स्वीकार किया है, लेकिन अब तक केवल ₹23.56 करोड़ की ही वसूली हो पाई है।

​जीएसटी पोर्टल और ई-वे बिल प्रणालियों में तकनीकी खामियों के कारण कर चोरी हुई।​आईटीआर और जीएसटी डेटा के बीच मिलान न होने से कई अपंजीकृत कारोबारी जाँच के दायरे से बाहर रहे।

​परिवहन विभाग की अनदेखी से एक लाख से अधिक बिना टैक्स वाले वाहन सड़कों पर संचालित होते रहे।​प्रधानमंत्री आवास योजना में भी ऑडिट के दौरान वित्तीय अनियमितताएँ उजागर हुई हैं।