सुधाकर
झारखंड में हाल ही में गठित सूचना आयोग और उसके नए सूचना आयुक्तों की कार्यशैली ने राज्य के प्रशासनिक और सामाजिक हलकों में एक नई बहस को जन्म दे दिया है। एक तरफ जहां समाजसेवी कोटे से राजनीतिक कार्यकर्ताओं की नियुक्तियों पर सवाल खड़े हो रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ नवनियुक्त आयुक्तों के आचरण ने पदों की मर्यादा और भारतीय संस्कृति के मूलभूत मूल्यों पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर कर दिया है।
भारतीय समाज और संस्कृति में पद, प्रतिष्ठा और सत्ता से भी ऊपर 'गुरु' का स्थान रहा है। प्राचीन काल से ही राजा-महाराजा भी अपने आचार्यों और गुरुओं के समक्ष नतमस्तक होते रहे हैं। पद अस्थायी होते हैं, लेकिन ज्ञान और संस्कार स्थायी। किसी भी व्यक्ति की सफलता का वास्तविक मापदंड उसकी उपलब्धियों के साथ-साथ उसकी विनम्रता से तय होता है।
जब कोई छात्र अपने ही विश्वविद्यालय में किसी उच्च पद पर पहुंचकर समीक्षा करने लौटता है, तो यह उसके लिए गर्व का क्षण होना चाहिए। लेकिन यह गर्व तब गरिमा खो देता है जब पद का अहंकार गुरुजन या संस्था के शीर्ष नेतृत्व (कुलपति) के सम्मान पर भारी पड़ने लगे।
रांची विश्वविद्यालय में नवनियुक्त सूचना आयुक्त तनुज खत्री द्वारा कुलपति की आधिकारिक कुर्सी पर बैठकर समीक्षा बैठक लेने की घटना प्रशासनिक शिष्टाचार (Administrative Etiquette) और नैतिक मूल्यों, दोनों दृष्टिकोण से चिंताजनक है।
विश्वविद्यालय में कुलपति संस्था का सर्वोच्च संवैधानिक और अकादमिक प्रमुख होता है। समीक्षा बैठकों में पदानुक्रम और शिष्टाचार का पालन आवश्यक होता है।
उसी विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र रहे व्यक्ति का कुलपति को दरकिनार कर उनकी ही कुर्सी पर आसीन होना सामान्य भाषा में 'अहंकार' और शिष्टाचार की कमी को दर्शाता है।आरटीआई की समीक्षा और क्रियान्वयन सुधार का माध्यम होना चाहिए, न कि प्रशासनिक शक्ति के प्रदर्शन का जरिया।
सूचना का अधिकार (आरटीआई) कानून पारदर्शी और निष्पक्ष शासन की नींव है। इसके आयुक्तों से निष्पक्षता, तटस्थता और उच्च नैतिक मानकों की अपेक्षा की जाती है। झामुमो, कांग्रेस और भाजपा जैसे राजनीतिक दलों के सक्रिय कार्यकर्ताओं को 'समाजसेवी' कोटे के तहत आयुक्त बनाना इस पद की मूल भावना पर प्रश्नचिह्न लगाता है।जब सूचना आयोग जैसे स्वतंत्र निकायों में राजनीतिक निष्ठा वाले चेहरे बैठते हैं, तो आम नागरिक के मन में निष्पक्ष न्याय पाने की उम्मीद कमजोर होती है।
इस घटनाक्रम का एक और पहलू राज्य के शीर्ष नेतृत्व और उनके अधीनस्थों के व्यवहार का अंतर है। राज्य के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की पहचान अक्सर उनकी सार्वजनिक विनम्रता, वरिष्ठों व गुरुजनों के प्रति सम्मान और सौम्य व्यवहार से की जाती है। इसके विपरीत, उन्हीं के दल के पूर्व प्रवक्ता और नवनिर्वाचित आयुक्त का यह आचरण दिखाता है कि कैसे सत्ता या पद मिलते ही कुछ लोग अपनी जड़ों और मूल संस्कारों को भूल जाते हैं।
प्रशासनिक पदों की शक्ति का वास्तविक सौंदर्य विनम्रता और मर्यादा में निहित है। सूचना आयुक्त जैसे महत्वपूर्ण पद पर बैठे व्यक्तियों को यह समझना होगा कि पद की गरिमा केवल उनके अधिकारों से नहीं, बल्कि उनके आचरण और दूसरों को दिए जाने वाले सम्मान से तय होती है। गुरुजनों और संवैधानिक पदों का आदर ही किसी भी प्रशासनिक व्यवस्था को जनता की नजरों में सम्माननीय बनाता है।
