रांची। ​ओडिशा के नवनियुक्त राज्यपाल और झारखंड बीजेपी के अनुसूचित जाति मोर्चा के प्रभारी ब्रज मोहन राम का एक बयान इन दिनों चर्चा का केंद्र बना हुआ है। रांची में पीटीआई से बातचीत और पत्रकारों के सवालों के जवाब के दौरान उन्होंने पार्टी के प्रति वफादारी, टिकट कटने के बावजूद संघर्ष और ओडिशा में बीजेपी के एससी मोर्चे को मजबूत करने की बात कही है। उनके इस बयान के बाद सोशल मीडिया और राजनीतिक गलियारों में बहस छिड़ गई है कि क्या एक संवैधानिक पद पर बैठने के बाद इस तरह के राजनीतिक बयान देना उचित है।

​ब्रज मोहन राम ने बताया कि उन्हें तीन बार लोकसभा चुनाव में टिकट नहीं मिला, लेकिन इसके बावजूद वे दल-बदल करने के बजाय पार्टी के साथ डटे रहे और बीजेपी उम्मीदवारों की जीत सुनिश्चित की। उन्होंने इस संवैधानिक पद मिलने का श्रेय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह और माता रानी की कृपा को दिया।

​उन्होंने कहा कि वे ओडिशा जाकर वहां के एससी समुदाय की स्थिति देखेंगे, बीजेपी के एससी मोर्चा को मजबूत करेंगे और दलित समुदाय के वोट बीजेपी के पक्ष में लाने की दिशा में काम करेंगे।

​राज्यपाल जैसे गैर-राजनीतिक और संवैधानिक पद पर रहते हुए पार्टी के पक्ष में काम करने और वोट दिलाने वाले बयान पर जब विवाद बढ़ा, तो ब्रज मोहन राम की तरफ से सफाई आई। उन्होंने कहा कि उन्होंने अभी औपचारिक रूप से बीजेपी से त्यागपत्र नहीं दिया है, इसलिए यह बात उन्होंने एक साधारण पार्टी कार्यकर्ता की भावनाओं के तहत कही थी। हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि राज्यपाल का पद पूरी तरह संवैधानिक है और पदभार संभालने के बाद वे इसकी गरिमा और मर्यादा का पूरा पालन करेंगे, क्योंकि राज्यपाल किसी एक दल के नहीं बल्कि पूरे राज्य के होते हैं।

​उल्लेखनीय है कि पलामू से तीन बार सांसद रह चुके ब्रज मोहन राम पिछले करीब 20 वर्षों से झारखंड बीजेपी एससी मोर्चा के प्रदेश प्रभारी/अध्यक्ष के रूप में सक्रिय रहे हैं।