​रांची। मोरहाबादी मैदान में 30 अगस्त को आयोजित होने वाली 'आदिवासी एकता महारैली' का केंद्रीय सरना समिति, जनजाति सुरक्षा मंच और झारखंड आदिवासी सरना विकास समिति समेत कई आदिवासी संगठनों ने कड़ा विरोध जताया है। शुक्रवार को प्रेस क्लब में आयोजित प्रेस वार्ता के दौरान सामाजिक व धार्मिक प्रतिनिधियों ने इस रैली के उद्देश्य और इसमें चर्च की बढ़ती भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े किए।

​प्रेस वार्ता में केंद्रीय सरना समिति के अध्यक्ष बबलू मुंडा ने कहा कि जब भी ईसाई मिशनरियों पर कोई संकट आता है, तब आदिवासी एकता के नाम पर माहौल बनाया जाता है। उन्होंने कहा कि यदि ये लोग सच्चे आदिवासी होते, तो आदिवासियों की सामाजिक और धार्मिक मान्यताओं और पूजा स्थलों को नुकसान पहुंचाने की बात नहीं करते।

​मुख्य पाहन जगलाल पाहन ने कहा कि धर्मांतरित ईसाई कानूनन ग्राम प्रधान जैसे पदों के योग्य नहीं हैं, फिर भी वे आदिवासियों के संवैधानिक और पारंपरिक पदों पर काबिज हैं। उन्होंने बड़े पैमाने पर हो रहे धर्मांतरण को आदिवासियों के अस्तित्व और अस्मिता के लिए सबसे बड़ा खतरा बताते हुए मांग की कि धर्मांतरित ईसाइयों को आदिवासी आरक्षण और मिलने वाली सुविधाओं से वंचित (डीलिस्ट) किया जाना चाहिए।

​झारखंड आदिवासी सरना विकास समिति के अध्यक्ष मेघा उरांव ने आरोप लगाया कि परिसीमन, विदेशी फंडिंग (एफसीआरए) और डीलिस्टिंग जैसे प्रमुख मुद्दों से ध्यान भटकाने के लिए इस रैली का सहारा लिया जा रहा है। उन्होंने कहा कि आदिवासियों के किसी भी मामले में चर्च का हस्तक्षेप स्वीकार्य नहीं है। मेघा उरांव का दावा है कि 15 अगस्त को पुरुलिया रोड स्थित बिशप हाउस से महाधर्माध्यक्ष ने एक पत्र जारी कर सभी पल्ली पुरोहितों को अधिक से अधिक संख्या में लोगों को जुटाने का निर्देश दिया है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि यह पूरी तरह से एक 'चर्च प्रायोजित' रैली है।

​इस प्रेस वार्ता में केंद्रीय सरना समिति के प्रधान महासचिव अशोक मुंडा, हिंदुवा उरांव, जगन्नाथ भगत और सोमा उरांव समेत विभिन्न आदिवासी संगठनों के प्रतिनिधि मौजूद थे।