​रामगढ़।​ कहा जाता है कि मजबूरी अगर जिद्द बन जाए, तो बड़ी से बड़ी रुकावट भी रास्ता छोड़ देती है। रामगढ़ की कविता महतो की कहानी भी कुछ ऐसी ही है, जिनका हौसला और जज्बा आज पूरे इलाके में मिसाल बन गया है।

​पति के जाने के बाद कविता पर अपने दो छोटे बच्चों और बूढ़े सास-ससुर की जिम्मेदारी आ गई। परिवार का पेट पालने और बच्चों का भविष्य संवारने के लिए उन्होंने होमगार्ड भर्ती में शामिल होने का फैसला किया। लेकिन गरीबी का आलम यह था कि उनके पास दौड़ने के लिए न तो ट्रैक सूट था और न ही स्पोर्ट्स शूज़।

​परेशानियों के आगे घुटने टेकने के बजाय कविता ने अपनी सादगी को ही अपनी ताकत बनाया। वह हर दिन सुबह 4 बजे उठकर साड़ी पहनकर ही दौड़ने का अभ्यास करती हैं। होमगार्ड की परीक्षा के दिन जब अन्य अभ्यर्थी आधुनिक तैयारी के साथ मैदान में थे, तब कविता कड़कड़ाती धूप में, साड़ी लपेटकर नंगे पांव ट्रैक पर उतरीं।

​मैदान में उनकी लगन का नतीजा ऐसा रहा कि जिस 10 मिनट की दौड़ को पूरा करने का लक्ष्य दिया गया था, उसे कविता ने महज़ 6 मिनट में ही नाप दिया।

​कविता का सपना सिर्फ एक नौकरी पाना नहीं, बल्कि अपने बच्चों को एक बेहतर भविष्य देना है। उनका यह अदम्य साहस यह साबित करता है कि अगर इरादे बुलंद हों, तो अभाव भी कामयाबी के आड़े नहीं आ सकता।