​रांची। बिरला इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी(बीआईटी),मेसरा का दीक्षांत समारोह का माहौल खुशियों और तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज रहा था। जब मंच से आरती कुमारी का नाम पुकारा गया, तो वह सिर्फ एक डिग्री लेने नहीं, बल्कि दो दशकों से अधिक लंबे संघर्ष, त्याग और गरीबी पर जीत का परचम लहराने आगे बढ़ रही थी। आरती को जब इंजीनियरिंग में पीएचडी की उपाधि सौंपी गई, तब सभागार में बैठी एक अधेड़ महिला की आँखों से आँसू छलक पड़े—ये आरती की माँ, रानू देवी थीं।

​रानू देवी उसी बीआईटी मेसरा संस्थान में पिछले 26 वर्षों से झाड़ू-पोछा लगाकर अपने परिवार का पेट पाल रही हैं। जिस परिसर के कमरों और गालियों की वे हर सुबह सफाई करती थीं, आज उसी परिसर की सबसे बड़ी अकादमिक डिग्रियों में से एक उनकी बेटी के हाथों में थी।

​रानू देवी भले ही खुद अनपढ़ हैं, लेकिन उन्होंने अपनी आँखों में बच्चों के बेहतर भविष्य का सपना सजा रखा था। पति के असमय निधन ने उन पर मुसीबतों का पहाड़ तोड़ दिया। तीन छोटे-छोटे बच्चों की जिम्मेदारी, सिर पर छप्पर बनाए रखने की चुनौती और पेट भरने की जद्दोजहद।

​जब रानू देवी ने बीआईटी मेसरा में बतौर सफाईकर्मी काम शुरू किया था, तब उन्हें हफ्ते के महज 400 रुपये मिलते थे। समय बदला, वेतन बढ़ा और आज उन्हें 15,000 रुपये प्रतिमाह मिलते हैं। लेकिन इन 26 सालों में जो एक चीज नहीं बदली, वह थी रानू देवी की यह जिद्द—“चाहे जो हो जाए, बच्चों की पढ़ाई रुकने नहीं दूंगी।”

​रांची के अनगड़ा प्रखंड स्थित तुरुप गांव की रहने वाली आरती अपने तीन भाई-बहनों में मझली है। घर में आर्थिक तंगी का साया हमेशा बना रहता था, लेकिन आरती ने अपनी माँ के हाथों के छालों और पसीने की कीमत समझी।

​पढ़ाई में होनहार आरती ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। उन्होंने आरटीसी, ओरमांझी से बीटेक की पढ़ाई पूरी की।

इसके बाद बीआईटी मेसरा से एमटेक किया और वहीं से शोध करते हुए इंजीनियरिंग में पीएचडी हासिल की।

​इस पूरे सफर में बीआईटी मेसरा की मदद और सरकारी छात्रवृत्तियों ने आरती के सपनों को पंख दिए।

​आरती कुमारी आज अपने गाँव तुरुप की पहली ऐसी महिला बन गई हैं, जिन्होंने इंजीनियरिंग में पीएचडी की उपाधि प्राप्त की है।

​आरती की यह सफलता केवल एक डिग्री भर नहीं है। यह कहानी है उस माँ के संकल्प की, जिसने आर्थिक विपन्नता के आगे घुटने नहीं टेके। यह मिसाल है उस बेटी के समर्पण की, जिसने अपनी माँ के संघर्ष को एक ऐतिहासिक उपलब्धि में बदल दिया। बीआईटी मेसरा के गलियारों में झाड़ू लगाने वाली रानू देवी ने आज समाज को सिखा दिया है कि अगर हौसले बुलंद हों, तो मुफ्फलिसी भी सफलता का रास्ता नहीं रोक सकती।