सुधाकर

​15 नवंबर 2000 को जब झारखंड भारत के मानचित्र पर 28वें राज्य के रूप में उभरा, तो यह केवल सीमाओं के पुनर्गठन का परिणाम नहीं था। यह 'जल, जंगल, जमीन' की रक्षा और स्थानीय जनमानस के स्वाभिमान के लिए लड़े गए दशकों लंबे संघर्ष का प्रतिफल था। इस नए राज्य की संकल्पना तीन मुख्य स्तंभों पर टिकी थी:

​सामाजिक-आर्थिक सशक्तीकरण: सदियों से हाशिए पर रहे आदिवासी और मूलवासी समुदायों को विकास की मुख्यधारा से जोड़ना।

​संसाधनों का न्यायसंगत दोहन: प्रचुर खनिज संपदा का लाभ सीधे राज्य के बुनियादी ढांचे और निवासियों के विकास में लगाना।

​पारदर्शी व निष्पक्ष शासन: एक ऐसी प्रशासनिक व्यवस्था स्थापित करना जहाँ केवल योग्यता और पारदर्शिता सर्वोपरि हो।

​राज्य गठन के दिन (14नवंबर,2000)बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव ने रांची एयरपोर्ट में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस कर यह आशंका जताई थी कि यदि इस क्षेत्र को दूरदर्शी नीति और दृढ़ इच्छाशक्ति वाला शासन नहीं मिला, तो यह माफिया, बिचौलियों और भ्रष्ट तंत्र की गिरफ्त में आ सकता है। ढाई दशकों के सफर के बाद, आज राज्य में जारी घटनाक्रम इस चेतावनी को केवल दोहराते ही नहीं, बल्कि एक गंभीर आत्म-विश्लेषण के मुहाने पर खड़ा करते हैं।

​संवैधानिक प्रावधान बनाम ज़मीनी हकीकत (अनुच्छेद 316)

​किसी भी राज्य के प्रशासनिक ढांचे की रीढ़ उसका 'लोक सेवा आयोग' होता है। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 316 राज्य लोक सेवा आयोग (एसपीएससी) के अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति तथा उनकी सेवा शर्तों का स्पष्ट निर्धारण करता है।

​50% का प्रशासनिक नियम: संविधान के अनुसार आयोग के कम से कम 50% सदस्य ऐसे होने चाहिए जिन्हें केंद्र या राज्य सरकार के अधीन न्यूनतम 10 वर्षों का प्रशासनिक अनुभव प्राप्त हो।

​शेष 50% विशेषज्ञ: शेष 50% सदस्यों में शिक्षाविदों, न्यायविदों या प्रतिष्ठित विशेषज्ञों के मनोनयन का प्रावधान है, ताकि निष्पक्षता और उच्च गुणवत्ता बनी रहे।

​वास्तविकता: विभिन्न जांच रिपोर्टों और जनहित याचिकाओं (PILs) से यह बात बार-बार उजागर हुई है कि नियुक्तियों में संवैधानिक मानकों और योग्यता को दरकिनार कर राजनीतिक पृष्ठभूमि, पक्षपात और 'कोटा प्रणाली' को तरजीह दी गई। जब आयोग के शीर्ष पदों पर आसीन व्यक्तियों का चयन ही निष्पक्ष न हो, तो उनके द्वारा संचालित संपूर्ण परीक्षा प्रणाली (प्रश्नपत्र निर्माण, मूल्यांकन व साक्षात्कार) पर जन-साधारण का विश्वास डगमगाना स्वाभाविक है।

​संस्थागत धांधली: ऐतिहासिक घोटालों से लेकर वर्तमान संकट तक

​झारखंड लोक सेवा आयोग (जेपीएससी) और झारखंड कर्मचारी चयन आयोग (जेएसएससी) की साख पर शुरुआत से ही प्रश्नचिह्न लगते रहे हैं, जिनकी परिणति केंद्रीय जांच एजेंसियों के हस्तक्षेप के रूप में हुई।

​सीबीआई जांच और दंडहीनता (Impunity) का माहौल: झारखंड में राष्ट्रपति शासन के दौरान तत्कालीन राज्यपाल सैयद सिब्ते रजी के आदेश पर सतर्कता विभाग ने प्रथम संयुक्त सिविल सेवा परीक्षा की जांच शुरू की। गड़बड़ियों की गंभीरता को देखते हुए झारखंड उच्च न्यायालय ने मामला सीबीआई को सौंपा। सीबीआई ने आयोग के तत्कालीन शीर्ष पदाधिकारियों, बिचौलियों और फर्जी अभ्यर्थियों को नामजद कर चार्जशीट दाखिल की और कई लोग जेल भी गए।

​सबसे चिंताजनक पहलू: चार्जशीटेड और आरोपी अधिकारियों/अभ्यर्थियों पर राज्य या केंद्र सरकार द्वारा कोई ठोस प्रशासनिक कार्रवाई नहीं की गई। इसके विपरीत, कई आरोपियों को पदोन्नतियाँ देकर शीर्ष पदों पर बहाल रखा गया। इस दंडहीनता ने भ्रष्ट तंत्र के मनोबल को बढ़ाया और सज़ा का भय समाप्त कर दिया। सरकारें बदलती रहीं, लेकिन,जेपीएससी में राजनीतिक कोटा और 'नियुक्ति का कारोबार' जारी रहा।

​वर्तमान स्थिति और वित्तीय अपराध: समस्या केवल शुरुआती वर्षों तक सीमित नहीं रही। हाल के वर्षों में भी जेपीएससी और जेएसएससी द्वारा आयोजित विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं के प्रश्नपत्र लीक होने, ओएमआर शीट में हेरफेर और डिजिटल धांधली के मामले सामने आते रहे हैं। स्थिति की विडंबना यह है कि अब इन भर्ती घोटालों के वित्तीय व आपराधिक तार जोड़ने के लिए प्रवर्तन निदेशालय (ईडी)और सीआईडी जैसी एजेंसियों को उतरना पड़ रहा है।

​युवाओं पर दुष्प्रभाव: एक पीढ़ी का आर्थिक व मानसिक शोषण

​निरंतर संस्थागत विफलताओं का सबसे भयावह और दर्दनाक असर राज्य के उन लाखों मेधावी युवाओं पर पड़ा है जो प्रतिकूल परिस्थितियों में वर्षों तक प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते हैं। बार-बार पर्चा लीक होने, धांधली और मुकदमों के कारण भर्ती प्रक्रियाएं सालों लटकी रहती हैं, जिससे कई योग्य अभ्यर्थियों की अधिकतम आयु सीमा समाप्त हो जाती है।

​ लगातार अनिश्चितता, स्थगन और रद्द होती परीक्षाओं से छात्र गहरे मानसिक तनाव, अवसाद और आर्थिक तंगी का शिकार हो रहे हैं।

पारदर्शी प्रणाली के अभाव में योग्य और मेधावी छात्र हतोत्साहित होकर अन्य राज्यों का रुख करने पर मजबूर हैं।

​व्यवस्था से भरोसा उठने का ही परिणाम है कि आज छात्र संगठन और अभ्यर्थी सड़कों पर उतरकर उग्र आंदोलन करने को बाध्य हैं।

​भावी राह: विश्वास बहाली के लिए आवश्यक प्रशासनिक सुधार

​झारखंड को अपने गठन के मूल आदर्शों पर वापस लौटाने और संवैधानिक संस्थाओं में जनता का विश्वास बहाल करने के लिए तुरंत कठोर कदम उठाने होंगे।

​अनुच्छेद 316 का कड़ाई से अनुपालन: आयोग में अध्यक्ष एवं सदस्यों की नियुक्ति से राजनीतिक हस्तक्षेप पूरी तरह समाप्त हो। 50% अनुभवी प्रशासक और 50% प्रतिष्ठित विशेषज्ञों और सत्यनिष्ठ व्यक्ति के संवैधानिक नियम का अक्षरशः पालन किया जाए।

​जीरो-लीकेज तकनीक : यूपीएससी की तर्ज पर प्रश्नपत्र निर्माण से लेकर छपाई, परिवहन और डिजिटल मूल्यांकन तक अत्याधुनिक सुरक्षा मॉडल और पारदर्शी तकनीक अपनाई जाए।

​फ़ास्ट-ट्रैक कोर्ट और कठोर सज़ा: परीक्षा धांधली में लिप्त बिचौलियों, कोचिंग माफिया, संलिप्त अभ्यर्थियों और अधिकारियों के विरुद्ध समयबद्ध अदालती कार्रवाई कर कठोर सज़ा सुनिश्चित की जाए।

​वार्षिक परीक्षा कैलेंडर: यूपीएससी की तर्ज पर जेपीएससी और जेएसएससी का एक निश्चित, पारदर्शी और प्रतिबद्ध वार्षिक कैलेंडर लागू किया जाए और उसका पालन अनिवार्य हो।

​झारखंड का गठन केवल एक भौगोलिक पृथकता के लिए नहीं, बल्कि एक न्यायपूर्ण, पारदर्शी और समृद्ध समाज के निर्माण के लिए हुआ था। जेपीएससी और जेएसएससी जैसी संवैधानिक संस्थाओं की साख की रक्षा करना केवल एक प्रशासनिक आवश्यकता नहीं, बल्कि राज्य के लाखों युवाओं के भविष्य को सुरक्षित करने की प्राथमिक शर्त है। जब तक चयन प्रक्रिया में केवल योग्यता और निष्पक्षता की गारंटी नहीं होगी, तब तक 'समृद्ध और आत्मनिर्भर झारखंड' का सपना अधूरा ही रहेगा।