रांची।झारखंड की सियासत और खास तौर पर कांग्रेस के अंदरूनी गलियारों में इस वक्त भारी हलचल है। झारखंड प्रदेश कांग्रेस कमेटी (जेपीसीसी) के अध्यक्ष केशव महतो कमलेश की कुर्सी पर खतरे को लेकर पार्टी के भीतर सुगबुगाहट काफी तेज हो चुकी है। इसी बीच 20 जुलाई को कांग्रेस के प्रदेश प्रभारी के. राजू का चार दिवसीय रांची दौरा शुरू हो रहा है। इस दौरे को सामान्य सांगठनिक बैठक न मानकर राज्य में बड़े राजनीतिक फेरबदल के संकेत के रूप में देखा जा रहा है।

​झारखंड में संगठनात्मक बदलावों और आगामी रणनीतियों को लेकर प्रभारी के. राजू का यह चार दिवसीय प्रवास बेहद अहम है। पार्टी सूत्रों के अनुसार इस दौरे के दौरान केवल समीक्षा बैठकें ही नहीं होंगी,बल्कि राज्य नेतृत्व की कार्यशैली और उसके राजनीतिक असर का एक गुप्त मूल्यांकन भी आलाकमान को सौंपा जाएगा।

​केशव महतो कमलेश को जब प्रदेश अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी सौंपी गई थी, तो मुख्य उद्देश्य ओबीसी (खासकर कुर्मी) वोट बैंक को साधना था। हालांकि, पार्टी के अंदरूनी गुटों का एक बड़ा धड़ा वर्तमान संगठनात्मक तालमेल से खुश नहीं है। पिछले कुछ समय में पार्टी कार्यकर्ताओं और जमीनी नेताओं के बीच यह धारणा बनी है कि मौजूदा नेतृत्व संगठन में नई ऊर्जा फूंकने और सहयोगियों (झामुमो और राजद) के साथ मजबूती से तोलमोल करने में उम्मीदों पर पूरी तरह खरा नहीं उतर पा रहा है।

​झारखंड कांग्रेस हमेशा से आंतरिक गुटबाजी से जूझती रही है। के. राजू के सामने सबसे बड़ी चुनौती वरिष्ठ नेताओं और असंतुष्ट खेमों के बीच समन्वय बनाना है। पार्टी के अंदरखाने में चर्चा है कि यदि गुटबाजी को तुरंत काबू में नहीं किया गया, तो आने वाले समय में चुनावी मोर्चे पर इसका सीधा नुकसान उठाना पड़ सकता है। प्रभारी अपने इस लंबे दौरे में वन-टू-वन बातचीत के जरिए नाराज नेताओं की नब्ज टटोलेंगे।

​यदि केशव महतो कमलेश की विदाई की चर्चाओं में दम है, तो इसके पीछे कांग्रेस की नई सोशल इंजीनियरिंग रणनीति हो सकती है। पार्टी के रणनीतिकारों का मानना है कि केवल एक जाति या वर्ग पर फोकस करने के बजाय, संगठन का नेतृत्व ऐसे चेहरे को दिया जाए जो आदिवासी, मूलवासी और अल्पसंख्यक समीकरणों को एक साथ साध सके। झामुमो के पास मजबूत आदिवासी आधार होने के कारण कांग्रेस राज्य में गैर-आदिवासी या दलित-अल्पसंख्यक वर्ग के किसी बड़े चेहरे को आगे कर सकती है, जिससे गठबंधन का संतुलन बना रहे।

​प्रभारी का यह दौरा किसी रूटीन विजिट जैसा नहीं है। इसे कांग्रेस आलाकमान का "मिशन झारखंड" माना जा रहा है। के. राजू प्रदेश के विधायकों, पूर्व विधायकों, जिला अध्यक्षों और प्रमुख प्रभारियों से अकेले में मिलकर वर्तमान अध्यक्ष के कामकाज और संगठन की स्थिति पर स्पष्ट फीडबैक लेंगे।राज्य सरकार में कांग्रेस के मंत्रियों की कार्यप्रणाली और मुख्यमंत्री आवास के साथ उनके समन्वय की समीक्षा की जाएगी।

चार दिनों के मंथन के बाद के. राजू दिल्ली लौटकर कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और राहुल गांधी को अपनी रिपोर्ट सौंपेंगे, जिसके आधार पर नेतृत्व परिवर्तन का अंतिम फैसला लिया जा सकता है।

​राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि राजनीति में जब इस तरह के बड़े नेताओं के मैराथन दौरे होते हैं, तो वे बिना किसी ठोस इनपुट या बड़े फैसले के समाप्त नहीं होते।