सुधाकर
किसी ने बहुत खूब कहा है कि "मनुष्य अगर अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण पा ले, तो वह संसार का सबसे सुखी इंसान बन जाता है।"
आधुनिक दुनिया जब असीम इच्छाओं, प्रतिस्पर्धा और भौतिक सुख-सुविधाओं की अंधी दौड़ में हांफ रही है, तब हमारे आदिवासी समाज का जीवन दर्शन हमें ठहरकर सोचने पर मजबूर करता है। आदिवासियों को यदि एक 'साधक' के रूप में देखा जाए, तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। वे एक ऐसे साधक हैं जिनकी साधना किसी गुफा या मंदिर तक सीमित नहीं, बल्कि प्रकृति की विशाल गोद में हमेशा चलती रहती है।
प्रकृति पूजा और सहअस्तित्व का अटूट बंधन
झारखंड, जिसका शाब्दिक अर्थ ही 'झाड़ियों और जंगलों का भू-भाग' है, यहाँ का आदिवासी समाज सदियों से 'जल, जंगल और जमीन' की रक्षा को अपना परम धर्म मानता आया है। आदिवासी समाज प्रकृति का उपभोग नहीं, बल्कि उसकी पूजा करता है। 'सरहुल' पर्व में साल (सखुआ) के वृक्षों की पूजा हो या 'करमा' में करम की डाल की आराधना, यह समाज हमें सिखाता है कि प्रकृति से उतना ही लो जितना जीवन जीने के लिए आवश्यक है।
वह पेड़ों को काटने से पहले और नदियों से जल लेने से पहले प्रकृति माँ के प्रति आभार व्यक्त करते हैं। उनके लिए जंगल केवल लकड़ी का स्रोत नहीं, बल्कि उनकी संपूर्ण जीवन-रेखा और जीवन का आधार है।
झारखंड में संताल, मुंडा, उरांव, हो, खड़िया जैसी कई जनजातियाँ हैं। यद्यपि इनकी भाषाएँ, रीति-रिवाज और सांस्कृतिक विविधताएँ अलग-अलग हैं, लेकिन एक डोर जो इन सभी को आपस में बांधती है, वह है—न्यूनतम जरूरतों में अधिकतम खुश रहना।
"सादा जीवन, उच्च विचार" केवल एक कहावत नहीं, बल्कि आदिवासी समाज की रोज़मर्रा की हकीकत है।
आदिवासी समाज कभी भी किसी बात की शिकायत नहीं करता। सूखा हो या बारिश, वे कुदरत के हर फैसले को सहर्ष स्वीकार करते हैं।उनके पास भले ही कंक्रीट के आलीशान मकान न हों, लेकिन उनके मिट्टी के साफ-सुथरे घर प्रेम और आत्मीयता से महकते हैं।
उनके पास संचय की प्रवृत्ति नहीं होती। वे कल की चिंता में आज का सुख नहीं गंवाते। यही कारण है कि उनके चेहरों पर जो निश्छल और निश्चल मुस्कान दिखती है, वह बड़े-बड़े महलों में भी दुर्लभ है।
झारखंड के आदिवासियों की सामाजिक संरचना बेहद प्रगतिशील और अनुकरणीय है।यहाँ 'मैं' नहीं, बल्कि 'हम' की भावना सर्वोपरि है। सुख-दुख हो या खेती-बारी का काम, पूरा गाँव एक साथ मिलकर खड़ा होता है।
आदिवासी समाज में महिलाओं को सर्वोच्च सम्मान और स्वतंत्रता प्राप्त है। वहाँ दहेज जैसी कुरीतियाँ नहीं हैं, बल्कि समाज में महिलाओं की भागीदारी पुरुषों के बराबर होती है।
अभावों में भी गीत और संगीत की तान छेड़ देना आदिवासियों की सबसे बड़ी ताकत है। मांदर की थाप पर जब पूरा गाँव थिरकता है, तो सारे अभाव और थकान पल भर में गायब हो जाते हैं।
आज जब ग्लोबल वार्मिंग, पर्यावरण संकट और मानसिक तनाव से पूरी दुनिया परेशान है, तब झारखंड का आदिवासी समाज एक मार्गदर्शक दीपशिखा की तरह खड़ा है।
उनकी जीवन पद्धति हमें याद दिलाती है कि सच्ची खुशी भौतिक संसाधनों के अंबार में नहीं, बल्कि संतोष और प्रकृति के साथ तालमेल बिठाकर जीने में है। यदि हम अपनी ज़रूरतों को सीमित करना और प्रकृति का सम्मान करना सीख लें, तो हम भी जीवन के सच्चे सुख को प्राप्त कर सकते हैं। वास्तव में, झारखंड के ये प्रकृति-पुत्र हम सभी के लिए एक अनुपम प्रेरणा स्रोत हैं।
