सुधाकर
"युद्ध और प्रेम में सब जायज़ है" — यह पुरानी कहावत अब भारतीय राजनीति और प्रशासनिक गलियारों में नई परिभाषा गढ़ रही है। झारखंड से लेकर देश के विभिन्न कोनों तक आज जो दृश्य दिखाई दे रहा है, वह किसी नीति या सिद्धांत की राजनीति नहीं, बल्कि केवल और केवल 'पावर प्ले' का हिस्सा बन चुका है। राज्य के युवाओं के सपनों की बुनियाद पर बनी संस्थाएं — जेपीएससी और जेएसएससी — आज सियासी अखाड़ा बनकर रह गई हैं। परीक्षाओं में गड़बड़ी, पेपर लीक और फर्जीवाड़े के बीच पिसता केवल वही छात्र है जिसने रातों की नींद हराम करके तैयारी की थी।
राजनीतिक टूलकिट और सीबीआई बनाम सीआईडी का मोहरा
झारखंड में जेपीएससी और जेएसएससी की परीक्षाओं में सामने आई गड़बड़ियों ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि किस तरह जांच एजेंसियां राजनीतिक टूलकिट का हिस्सा बनती जा रही हैं।
राज्य सरकार द्वारा CID को जांच सौंपने और ताबड़तोड़ गिरफ्तारियां व छापेमारी करने के बावजूद, इसे महज एक ढाल या लीपापोती के रूप में देखा जा रहा है।
विपक्षी दल (भाजपा) बिना सीबीआई जांच के पीछे हटने को तैयार नहीं है। दिल्ली में गृह मंत्री के साथ हुई बैठकों के बाद सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाना और जनहित याचिका दायर करना यह स्पष्ट करता है कि लक्ष्य केवल छात्रों को न्याय दिलाना नहीं, बल्कि आगामी सियासी जमीन को मजबूत करना भी है।
लेकिन, इतिहास गवाह है कि सीबीआई की एंट्री मात्र से न्याय की गारंटी नहीं मिलती। जेपीएससी की पहली और तीसरी परीक्षा में हुई धांधली की जांच सीबीआई पिछले 13-14 वर्षों से कर रही है, लेकिन अभियुक्तों को सजा दिलाने में आज तक विफल रही है। इसके पीछे भी वही "राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी" और "गठबंधन के समीकरण" ही जिम्मेदार रहे हैं।
आज जो दल सत्ता में हैं या जो विपक्ष में बैठकर नैतिकता का पाठ पढ़ा रहे हैं, इस हमाम में सब नंगे नजर आते हैं। राज्य गठन के 25 वर्षों के भीतर यदि आज राज्य की सबसे बड़ी संवैधानिक संस्थाएं खोखली दिख रही हैं, तो इसकी शुरुआत शुरुआती दौर की सरकारों में ही हो गई थी।
जेपीएससी और जेएसएससी जैसी संस्थाओं में शीर्ष पदों पर भ्रष्ट अधिकारियों को बैठाकर सरकारी नौकरियां बेची गईं। बैकडोर एंट्री और सिफारिशी नियुक्तियों का यह दीमक राज्य के प्रशासनिक ढांचे को अंदर से चट कर चुका है।
आज जब हजारों छात्र सड़कों पर उतरकर आंदोलन कर रहे हैं, तब भी राजनीतिक दल केवल चुनिंदा मामलों पर ही उंगली उठाते हैं। विधानसभा और झारखंड एकेडमिक काउंसिल (जैक) में हुई संदिग्ध नियुक्तियों पर कोई दल खुलकर बात नहीं करना चाहता, क्योंकि वहां दोनों पक्षों के चहेतों की सिफारिशें और पैसे का लेन-देन शामिल रहा है।
जब तक कोई दल सत्ता में रहता है, वह अपनी जांच एजेंसियों (सीआईडी/एसआईटी) के जरिए मामले को नियंत्रित करने की कोशिश करता है; और जैसे ही विपक्ष में आता है, वही दल केंद्रीय एजेंसियों (सीबीआई/ईडी) का टूलकिट की तरह इस्तेमाल शुरू कर देता है।
अगर सुप्रीम कोर्ट का फैसला मामले को सीबीआई को सौंप भी देता है, तो सवाल वही रहता है — क्या इससे युवाओं को समय पर न्याय और पारदर्शी नौकरियां मिल पाएंगी? या यह मामला भी सालों तक फाइलों, अदालती तारीखों और राजनीतिक बयानों के बीच में दबकर रह जाएगा?
राजनीति में अब सब कुछ "जायज़" मान लिया गया है, लेकिन इस "सब जायज़" की कीमत राज्य का वह नौजवान चुका रहा है जिसकी आधी उम्र परीक्षा की तिथियों और अदालती फैसलों के इंतजार में गुजर जाती है। जब तक संवैधानिक संस्थाओं को राजनीतिक प्रभाव से मुक्त नहीं किया जाएगा, तब तक हर नई जांच केवल एक नया राजनीतिक हथकंडा ही बनी रहेगी।
