​रांची। सुप्रीम कोर्ट ने दुमका जिले से जुड़े एक दोहरे हत्याकांड के मामले में करीब आधी सदी तक चले मुकदमे को "न्यायिक व्यवस्था की विफलता" करार दिया है। अदालत ने मामले में एकमात्र जीवित 70 वर्षीय दोषी साइमन सोरेन की उम्र और गंभीर स्वास्थ्य स्थिति को ध्यान में रखते हुए उनकी सजा को निलंबित कर तुरंत रिहा करने का आदेश दिया है।

​जस्टिस जेबी पार्डीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने मामले की लंबी सुनवाई पर सख्त टिप्पणी की। शीर्ष अदालत ने कहा कि अपराध के बाद आरोपियों को 22 साल तक ट्रायल का सामना करना पड़ा और दोषसिद्धि के बाद अपील के निपटारे में भी दो दशक से अधिक का समय बीत गया। पीठ ने कहा कि दोहरे हत्याकांड जैसे गंभीर अपराध के बावजूद पिछले 45 सालों में आरोपी द्वारा झेली गई तकलीफों और उनकी मेडिकल स्थिति को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

यह मामला 18 अक्टूबर 1981 का है, जब दुमका जिले के भुरुंडिया गांव में धान काटने गए मंडल परिवार के सदस्यों पर हमला किया गया था। इस हमले में बिभूति मंडल और बनारसी मंडल की हत्या कर दी गई थी। मामले में छह लोगों को आरोपी बनाया गया था, जिनमें से दो की मौत आरोप तय होने से पहले ही हो गई। ट्रायल कोर्ट द्वारा 2002 में उम्रकैद की सजा सुनाए जाने के बाद हाईकोर्ट में अपील लंबित रहने के दौरान तीन अन्य दोषियों की भी मृत्यु हो गई। अब केवल साइमन सोरेन जीवित हैं, जो विभिन्न बीमारियों से ग्रस्त होकर हिरासत में इलाज करा रहे हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई में हुई भारी देरी के कारणों पर सवाल उठाते हुए झारखंड हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल से रिपोर्ट मांगी थी। रिपोर्ट में बताया गया कि आरोपियों के फरार रहने के कारण शुरुआती देरी हुई, लेकिन कोर्ट ने टिप्पणी की कि 1991 में आरोप तय होने के बाद भी ट्रायल पूरा होने में 12 साल लगने का कोई स्पष्ट कारण नहीं दिया गया। इस अवधि के दौरान मामला पांच बार अलग-अलग अदालतों में स्थानांतरित हुआ।

हाईकोर्ट ने 28 अक्टूबर 2024 को साइमन सोरेन की अपील खारिज करते हुए उम्रकैद की सजा बरकरार रखी थी। अब सुप्रीम कोर्ट ने मामले के मूल रिकॉर्ड की प्रतियां मंगवाते हुए अगली सुनवाई 18 सितंबर तय की है। अदालत ने संकेत दिया है कि उसकी चिंता केवल इस व्यक्तिगत मामले तक सीमित नहीं है, बल्कि देश भर में आपराधिक अपीलों के लंबे समय से लंबित रहने की व्यापक समस्या को लेकर है। इस गंभीर मुद्दे का संज्ञान लेते हुए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को भी मामले में पक्षकार बनाने का निर्देश दिया है।