सुधाकर
झारखंड में जेपीएससी-जेएसएससी की परीक्षाओं को लेकर बना गतिरोध अब महज़ एक प्रशासनिक मुद्दा न रहकर गहरा राजनीतिक और कानूनी संकट बन चुका है। राज्य सरकार द्वारा रद्द की गई परीक्षाओं के मामले में हाईकोर्ट के फैसले से शुरू हुई हलचल अब सुप्रीम कोर्ट तक पहुँच गई है। इस पूरे घटनाक्रम में जहाँ न्यायपालिका की सक्रियता (ज्यूडिशियल एक्टिविज्म) उभरकर सामने आ रही है, वहीं राज्य के मेधावी छात्रों का भविष्य अधर में लटकता दिख रहा है।
जेपीएससी जेएसएससी रिफॉर्म्स मंच का सीधा आरोप है कि हेमंत सोरेन सरकार ने हाईकोर्ट में अपना पक्ष मजबूती से नहीं रखा। राज्य के महाधिवक्ता की अनुपस्थिति और ढुलमुल पैरवी के कारण सरकार द्वारा परीक्षाओं को रद्द करने के फैसले पर कोर्ट ने रोक लगा दी।
इस कानूनी विफलता ने छात्रों के असंतोष को फिर से भड़का दिया है। इससे पहले, जब सरकार ने विशेष कैबिनेट में विवादित परीक्षाओं को रद्द करने की घोषणा की थी, तब आंदोलनकारियों ने राहत की सांस लेते हुए मुख्यमंत्री के प्रति 'आभार यात्रा' निकाली थी और अपना आंदोलन 60 दिनों के लिए स्थगित कर दिया था। हालांकि, अदालत के स्थगनादेश के बाद स्थिति अचानक बदल गई है। छात्र अब पुनः सड़कों पर उतरने की रणनीति बना रहे हैं, जिससे यह स्पष्ट होता है कि व्यवस्था पर से युवाओं का भरोसा डिग रहा है।
यह मामला अब केवल राज्य के दायरे तक सीमित नहीं है। इस विषय पर सुप्रीम कोर्ट में भी एक जनहित याचिका दायर की गई है, जिस पर मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ द्वारा 24अगस्त को सुनवाई संभावित है।
दूसरी ओर, इस प्रशासनिक-न्यायिक खींचतान के बीच राजनीतिक दल अपनी रोटियां सेकने में लगे हैं। विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी लगातार पूरे मामले की सीबीआई जांच की मांग कर रही है। हाल ही में नई दिल्ली में गृह मंत्री अमित शाह के साथ झारखंड भाजपा नेतृत्व की उच्च स्तरीय बैठक के बाद इस मुद्दे पर राजनीतिक घेराबंदी और तेज हो गई है।
हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक फाइलों की आवाजाही,अदालती आदेश और न्यायिक सक्रियता यह संकेत दे रहे हैं कि यह विषय धीरे-धीरे राज्य सरकार के सीधे नियंत्रण से बाहर होता जा रहा है। सरकार की कानूनी विफलता, विपक्ष की रणनीतिक घेराबंदी और छात्र संगठनों की बेबसी के इस त्रिकोण में अंतिम भुक्तभोगी झारखंड का वह मेधावी छात्र है, जो सालों से नियुक्ति पत्र का इंतजार कर रहा है। यदि जल्द ही इस मामले का कोई ठोस और पारदर्शी समाधान नहीं निकला, तो यह असंतोष राज्य में एक बड़े सामाजिक और राजनीतिक संकट का रूप ले सकता है।
