​खूंटी। सामूहिकता के बल पर हर असंभव काम को संभव किया जा सकता है। आदिवासी समाज के संघर्षपूर्ण जीवन में यह परंपरा सदियों से जीवित रही है। चाहे न्याय की लड़ाई हो या बंजर जमीन को उपजाऊ बनाने का संकल्प, आदिवासी समुदाय ने हमेशा एकजुटता को प्राथमिकता दी है। जंगलों को साफ कर खेती योग्य जमीन तैयार करने से लेकर आज गांवों में आपसी सहयोग से कृषि कार्य करने तक यह समृद्ध परंपरा कायम है।

​इसी परंपरा को जीवंत रखते हुए अड़की प्रखंड के मदहातू गांव में ग्रामीणों ने 'मदइत' (पारंपरिक सामूहिक श्रम) के तहत पहाड़ों पर स्थित खेतों में धान की रोपनी की। गांव के लोग एक-दूसरे के खेतों में सामूहिक रूप से पहुंचकर रोपनी का काम पूरा कर रहे हैं। इससे न केवल किसानों के श्रम और समय की बचत हो रही है, बल्कि गांव में आपसी सहयोग और भाईचारे की भावना भी मजबूत हो रही है।

​बदलाव के संवाहक बने लादु मुंडा

​मदहातू गांव के निवासी और पूर्व नक्सली लादु मुंडा इन दिनों गांव-गांव जाकर किसानों को सामूहिकता की ताकत का संदेश दे रहे हैं। उनके नेतृत्व में ग्रामीण उत्साहपूर्ण माहौल में धान की रोपाई कर रहे हैं। खेतों में बड़ी संख्या में ग्रामीण एक साथ जुटते हैं और बारी-बारी से एक-दूसरे के खेतों में रोपनी पूरी करते हैं।

​ग्रामीणों का मानना है कि सामूहिक श्रम की यह परंपरा गांव की पुरानी संस्कृति और पहचान का अहम हिस्सा है। इससे खेती का काम आसान होने के साथ-साथ आपसी एकजुटता भी बनी रहती है। लादु मुंडा का यह प्रयास न केवल इस प्राचीन परंपरा को फिर से पुनर्जीवित कर रहा है, बल्कि नई पीढ़ी को सामूहिकता और भाईचारे के महत्व से जोड़ने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।