रांची। भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष और राज्यसभा सांसद आदित्य साहू ने खनिज संशोधन विधेयक को लेकर झारखंड मुक्ति मोर्चा और विपक्षी दलों के विरोध को महज एक राजनीतिक ड्रामा करार देते हुए कहा कि केंद्र सरकार द्वारा लाया जा रहा यह विधेयक राज्यों के अधिकार या राजस्व छीनने के लिए नहीं, बल्कि खनन क्षेत्र में पारदर्शिता, निवेश और विकास को गति देने के लिए है।
आदित्य साहू ने स्पष्ट किया कि विधेयक को लेकर फैलाया जा रहा भ्रम पूरी तरह बेबुनियाद है। रॉयल्टी, डीएमएफ, नीलामी प्रीमियम, एनएमईटी और जीएसटी में राज्यों की हिस्सेदारी पहले की तरह बनी रहेगी। खनन क्षेत्र से मिलने वाले कुल भुगतान का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा सीधे राज्यों को ही मिलेगा। बालू, गिट्टी और साधारण मिट्टी जैसे लघु खनिजों पर राज्य सरकार का नियंत्रण पूर्ववत रहेगा।
उन्होंने आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि 2014-15 में कुल खनिज राजस्व में राज्यों की हिस्सेदारी 60 प्रतिशत थी, जो 2024-25 में बढ़कर 88 प्रतिशत से अधिक हो चुकी है। पिछले 10 वर्षों में राज्यों का खनिज राजस्व ₹25,206 करोड़ से 354 प्रतिशत बढ़कर ₹1,14,549 करोड़ पहुंच गया है।
भाजपा प्रदेश अध्यक्ष ने आरोप लगाया कि झारखंड सरकार की अदूरदर्शी नीतियों के कारण राज्य को भारी नुकसान हो रहा है। राज्य सरकार ने लौह अयस्क पर ₹600 प्रति टन और कोयले पर ₹450 प्रति टन तक का सेस लगा दिया है, जिससे बीसीसीएल के कोयला उत्पादन में 12.3 प्रतिशत की गिरावट आई है। अत्यधिक कर लगाने से वैध खनन प्रभावित हुआ है और अवैध माफिया तंत्र को बढ़ावा मिला है।
श्री साहू ने कहा कि देश के 40 प्रतिशत खनिज भंडार वाले झारखंड में पिछले 6 वर्षों में महज 4 खदानों की नीलामी हुई और उनमें से भी एक चालू नहीं हो सकी।
दूसरी ओर, पड़ोसी राज्य ओडिशा ने 35 खदानें चालू करके करीब ₹87,000 करोड़ का नीलामी प्रीमियम हासिल किया, जबकि झारखंड को इससे शून्य राजस्व मिला।
भाजपा अध्यक्ष ने मुख्यमंत्री से सवाल किया कि जल, जंगल और जमीन की बात करने वाली सरकार अपने कार्यकाल के विकास कार्यों का हिसाब दे। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार को केंद्रीय योजनाओं पर दोषारोपण करने के बजाय डीएमएफटी फंड के उपयोग का ब्योरा देना चाहिए। भाजपा का लक्ष्य खनन प्रभावित क्षेत्रों, आदिवासियों, दलितों और विस्थापित परिवारों तक खनन राजस्व का पारदर्शी लाभ पहुंचाना है।
