रांची। आजसू पार्टी के केंद्रीय अध्यक्ष सुदेश महतो ने झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) सरकार पर निशाना साधते हुए आरोप लगाया है कि राज्य सरकार एमएमडीआर एक्ट की आड़ में राजनीतिक टकराव पैदा कर रही है। गुरुवार को रांची स्थित पार्टी के केंद्रीय कार्यालय में पत्रकारों से बातचीत के दौरान उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट से मिले अधिकारों के बाद राज्य सरकार मिनरल बेयरिंग लैंड सेस लागू कर सकती थी, लेकिन अब एमएमडीआर एक्ट के तहत ऐसा स्वतंत्र रूप से संभव नहीं होगा।
सुदेश महतो ने स्पष्ट किया कि एमएमडीआर एक्ट की धारा 9डी में केंद्र सरकार द्वारा कुछ शर्तों के साथ राज्यों को सेस लगाने की अनुमति देने का प्रावधान है। उन्होंने केंद्र सरकार को इस विषय पर पत्र लिखकर हस्तक्षेप की मांग की है और 22 अगस्त को दिल्ली जाकर अपनी बात रखने की बात कही है।
आजसू प्रमुख ने राज्य सरकार पर खनिजों से अर्जित राजस्व के दुरुपयोग की आशंका जताई। उन्होंने आरोप लगाया कि राज्य में लगभग 10,000 करोड़ रुपये के डीएमएफटी फंड में अनियमितता हुई है।सेस लगाने से पहले राज्य में कोयला उत्पादन की वार्षिक वृद्धि दर लगभग 8% थी, जो अब घटकर 2% रह गई है।राज्य सरकार वैध कोयले को महंगा कर अवैध खनन और कालाबाजारी को बढ़ावा दे रही है।
उन्होंने कहा कि सरकार वित्तीय वर्ष 2025-26 की लगभग डेढ़ लाख करोड़ रुपये की बजटीय राशि का महज 25% ही खर्च कर पाई है, जो प्रशासनिक विफलता को दर्शाता है।
सुदेश महतो ने राज्य के युवाओं और प्रतियोगी परीक्षार्थियों के मुद्दों को उठाते हुए कहा कि सरकार छात्रों को छलने का काम कर रही है। जेपीएससी परीक्षाओं को रद्द करने का अधिकार केवल आयोग के पास है, न कि सरकार के पास। साथ ही, जिस सीआईडी ने पहले जेएसएससी सीजीएल परीक्षा में किसी भी तरह की गड़बड़ी से इंकार किया था,अब उसी को जांच का जिम्मा सौंपना राज्य सरकार की नीयत पर सवाल खड़े करता है।
जयराम महतो ने पीएम मोदी को पत्र लिख की विधेयक वापस लेने की मांग
रांची। झारखंड के डुमरी विधानसभा क्षेत्र से निर्दलीय विधायक जयराम महतो ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र भेजकर संसद में पारित 'खान और खनिज (विकास और विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026' पर पुनर्विचार करने और इसे वापस लेने का आग्रह किया है। उन्होंने पत्र के माध्यम से केंद्र सरकार का ध्यान इस संशोधन से राज्य के वित्तीय अधिकारों, राजस्व और विकास योजनाओं पर पड़ने वाले प्रतिकूल प्रभावों की ओर आकृष्ट किया है।
जयराम महतो ने पत्र में स्पष्ट किया है कि संशोधन विधेयक के प्रभावी होने से राज्य सरकार खनिजों और खनिज-धारित भूमि पर अतिरिक्त कर, उपकर (सेस) या अन्य शुल्क नहीं लगा पाएगी। देश के खनिज भंडार और कोयले का बड़ा हिस्सा झारखंड में है। ऐसे में सेस लगाने का अधिकार छिन जाने से राज्य की माली हालत पर सीधा असर पड़ेगा।
पत्र में दिए गए आंकड़ों के अनुसार झारखंड को 'झारखंड मिनरल बियरिंग लैंड सेस रूल्स' के तहत मुख्य रूप से कोयला और लौह अयस्क से राजस्व मिलता है।
वित्तीय वर्ष 2026-27 में सेस के जरिए ₹13,800 करोड़ का राजस्व जुटाने का लक्ष्य रखा गया है। राज्य सरकार को अब तक ₹4,400 करोड़ का राजस्व सेस के रूप में प्राप्त हो चुका है।विधेयक के लागू होने से यह वसूली बंद हो जाएगी, जिससे जनकल्याणकारी और ढांचागत विकास की योजनाओं पर दबाव बढ़ेगा।
विधेयक के विरोध के साथ विधायक ने राज्य की अन्य चिंताओं को भी पत्र में लिखा है। उन्होंने लिखा है कि राज्य के रैयतों ने खनन के लिए बड़े पैमाने पर जमीन दी है, जिसके बदले उन्हें विस्थापन और प्रदूषण का सामना करना पड़ रहा है। झारखंड सरकार का केंद्र पर कोयले की रॉयल्टी के रूप में ₹1.36 लाख करोड़ का बकाया लंबे समय से लंबित है, जिसका स्थायी समाधान अभी तक नहीं निकला है।
जयराम महतो ने इसे राज्य की 4 करोड़ जनता के अधिकारों से जुड़ा विषय बताते हुए कहा कि संघीय ढांचे के तहत झारखंड जैसे पिछड़े लेकिन खनिज-समृद्ध राज्य के साथ न्याय किया जाना चाहिए और राज्य हित में इस विधेयक को वापस लिया जाना चाहिए।
