रांची। झारखंड में परिसीमन के बहाने आदिवासी सीटों की संख्या कम किये जाने की आशंका आदिवासी संगठनों ने जतायी है। गुरुवार को रांची में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में केंद्रीय सरना समिति, आदिवासी लोहरा समाज समेत दूसरे संगठनों ने आरक्षित सीटों, सीएनटी-एसपीटी एक्ट, पांचवीं अनुसूची, जमीन और विस्थापन से जुड़े मुद्दों को प्रमुखता से उठाया। संगठनों ने साफ कहा कि परिसीमन की प्रक्रिया में आदिवासियों के लिए आरक्षित सीटों की संख्या कम नहीं की जानी चाहिए। सामाजिक कार्यकर्ता ग्लैडसन डुंगडुंग ने आरक्षित सीटों को कम करने के बजाय पांचवीं अनुसूची क्षेत्रों में प्रतिनिधित्व बढ़ाने पर केंद्र सरकार को विचार करने को कहा। उनके मुताबिक, परिसीमन का असर केवल चुनावी सीमाओं तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसका सीधा संबंध राजनीतिक प्रतिनिधित्व से भी होगा। इसलिए प्रक्रिया के दौरान आदिवासी क्षेत्रों और संवैधानिक प्रावधानों को ध्यान में रखना जरूरी है। केंद्रीय सरना समिति के अजय तिर्की समेत अन्य ने अवैध भूमि हस्तांतरण रद्द करने, मूल रैयतों को जमीन वापस दिलाने और पांचवीं अनुसूची के संवैधानिक प्रावधानों को प्रभावी तरीके से लागू करने की मांग भी रखी। पांचवीं अनुसूची क्षेत्रों को संविधान के तहत मिले विशेष अधिकारों को केवल कागजों तक सीमित रखे जाने की शिकायत की। इसके साथ ही पांचवीं अनुसूची क्षेत्रों में राज्यपाल को मिले संवैधानिक अधिकारों का पूर्ण इस्तेमाल करने की मांग की गई। आदिवासी संगठनों ने पिछले 75 वर्षों में हुए विस्थापन, भूमि से जुड़े विवादों और सांस्कृतिक नुकसान का आकलन कराने की मांग भी रखी। उनका कहना है कि प्रभावित लोगों को उचित मुआवजा, पुनर्वास और रोजगार की गारंटी मिलनी चाहिए। मांगें नहीं माने जाने पर राज्य में आंदोलन तेज करने की चेतावनी दी।