रांची। झारखंड लोक सेवा आयोग (जेपीएससी) के तत्कालीन चेयरमैन एल ख्यांगते और तत्कालीन परीक्षा नियंत्रक श्वेता गुप्ता के कार्यकाल में आयोजित परीक्षाएं नियमों और प्रावधानों को ताक पर रखकर कराई गई थीं। अपराध अनुसंधान शाखा (सीआईडी) की चार्जशीट में इन दोनों को परीक्षा घोटालों का ‘मास्टरमाइंड’ (असल सूत्रधार) बताया गया है।
जांच में खुलासा हुआ है कि जेपीएससी में इन दोनों की ऐसी ‘मोनोपॉली’ थी कि इनके आदेश और दबाव के आगे आयोग के अधिकारी और कर्मी पूरी तरह ‘सरेंडर’ थे। फाइलों पर संबंधित अधिकारियों से जबरन हस्ताक्षर कराए जाते थे।
तत्कालीन उप परीक्षा नियंत्रक सुमंत तिर्की ने सीआईडी के समक्ष स्वीकार किया कि फाइलों पर जबरन हस्ताक्षर कराए जाते थे। वहीं, पूर्व परीक्षा नियंत्रक असीम किस्पोट्टा ने बताया कि उन्होंने एल ख्यांगते को पहले ही जानकारी दे दी थी कि दागी एजेंसी ‘टीडीपीएल’ के निदेशक को उत्तर प्रदेश एसटीएफ द्वारा पेपर लीक मामले में गिरफ्तार किया जा चुका है और इस एजेंसी को पैनल में शामिल नहीं किया जाना चाहिए। इस चेतावनी पर कोई कार्रवाई करने के बजाय, उनसे प्रभार लेकर श्वेता कुमारी गुप्ता को परीक्षा नियंत्रक बना दिया गया।
श्वेता ने सीआईडी पूछताछ में कबूला कि टीडीपीएल को बिना किसी टेंडर और बिना कंपनी की छानबीन के सीधे नॉमिनेशन के आधार पर कार्यादेश (वर्क ऑर्डर) दिया गया था।
5 जून 2026 को जब स्थायी परीक्षा नियंत्रक अवकाश पर थे, तब श्वेता ने डेंटिस्ट परीक्षा (विज्ञापन 01/2022) की गोपनीय फाइल में खुद को ‘परीक्षा नियंत्रक प्रभारी’ बताते हुए एएलपीएस, टीडीपीएल और नैवे (NAIVE) का फर्जी रेट चार्ट तैयार किया। इसमें टीडीपीएल को एल-1 बताकर उसे काम देने की संस्तुति की गई। उसी दिन एल ख्यांगते ने इस पर अपनी औपचारिक सहमति देते हुए स्वीकृति पत्र और एकरारनामा जारी कर दिया। बाद में तत्कालीन अध्यक्ष ने 11वीं-13वीं संयुक्त सिविल सेवा परीक्षा (विज्ञापन 01/2024) की कोडिंग-डिकोडिंग भी इसी अवैध एकरारनामा के तहत कराने का निर्देश दिया।
सीआईडी जांच में यह भी सामने आया कि एएलपीएस सॉल्यूशंस और नैवे एसेसमेंट के निदेशक गौरव भुटानी ने जेपीएससी को परीक्षा संचालन का कोई प्रस्ताव दिया ही नहीं था। स्पष्ट है कि श्वेता गुप्ता ने ही टीडीपीएल को अवैध तरीके से पैनल में शामिल करने का षडयंत्र रचा और दोनों कंपनियों के जाली कागजात फाइल में गलत तरीके से संलग्न किए।
