अमित झा
देश की आजादी की 80वीं सालगिरह झारखंड के लिए एक ऐतिहासिक मोड़ लेकर आई है। जिस राज्य का एक बड़ा हिस्सा दशकों तक 'लाल आतंक' (वामपंथी उग्रवाद) के खौफ में सांसें लेता था, आज वही इलाका पूर्ण रूप से नक्सल मुक्त होने की राह पर खड़ा है। इस साल 15 अगस्त को राज्य के उन सुदूर और दुर्गम इलाकों में भी राष्ट्रध्वज तिरंगा शान से लहराता दिखेगा और राष्ट्रगान की गूंज सुनाई देगी, जहाँ कल तक बंदूकों के साये में स्वतंत्रता दिवस के बजाय 'काला दिवस' मनाया जाता था।
वर्ष 2000 में बिहार से अलग होकर नए राज्य के रूप में अस्तित्व में आया झारखंड अपनी अपार संभावनाओं के बल पर आगे बढ़ना चाहता था। लेकिन नक्सलवाद ने दो दशकों से भी अधिक समय तक इसकी तरक्की की रफ्तार पर ब्रेक लगाए रखा।
एक समय स्थिति यह थी कि राज्य के 24 में से 21 जिले लाल आतंक की चपेट में थे। नक्सलियों की 'जन अदालतों' में फैसले हुआ करते थे और ग्रामीण खौफ में जीने को मजबूर थे।
सारंडा, पारसनाथ, झूमरा पहाड़, बुढ़ा पहाड़ और चतरा-लातेहार के सीमावर्ती इलाकों में प्रशासनिक मशीनरी का पहुँचना बेहद कठिन था। सड़कें, स्कूल, अस्पताल और बिजली जैसी बुनियादी सुविधाएँ लाल आतंक की भेंट चढ़ चुकी थीं।
पिछले कुछ वर्षों में केंद्र और राज्य सरकार के दृढ़ संकल्प, झारखंड पुलिस, सीआरपीएफ, कोबरा बटालियन और झारखंड जगुआर के बेहतर तालमेल ने नक्सलियों के सबसे मजबूत गढ़ों में सेंध लगाई।
झारखंड-छत्तीसगढ़ सीमा पर स्थित और नक्सलियों का सबसे सुरक्षित किला माने जाने वाले 'बुढ़ा पहाड़' को माओवादियों से पूरी तरह मुक्त कराया गया।
कोल्हान और सारंडा के जंगलों में सक्रिय भाकपा (माओवादी) नेटवर्क को ध्वस्त किया गया।
इस रणनीतिक अभियान के तहत 28 जुलाई को ₹2.20 करोड़ के इनामी शीर्ष नक्सली मिसिर बेसरा और ₹15 लाख के इनामी मेहनत उर्फ विभीषण जैसे बड़े कमांडरों को गिरफ्तार किया गया।
इसके अलावा, सुदूर इलाकों में फॉरवर्ड ऑपरेटिंग बेस स्थापित करने से नक्सलियों का रसद-सप्लाई नेटवर्क और जनाधार पूरी तरह समाप्त हो गया।
चालू वर्ष में सुरक्षा बलों की रणनीति अभूतपूर्व रूप से सफल रही है।
44 नक्सलियों की गिरफ्तारी और करीब 50 द्वारा आत्मसमर्पण किया गया।पुलिस मुठभेड़ों में दो दर्जन के करीब उग्रवादियों का खात्मा हुआ।
'नई दिशा' जैसी पुनर्वास नीतियों से प्रभावित होकर 7 अगस्त को ही सलूका कायम, पिंकी और कोदूमुनी जैसे 3 खूंखार नक्सलियों ने हथियार डाले।
परिणामस्वरूप, राज्य का आखिरी नक्सल प्रभावित जिला माना जाने वाला चाईबासा भी अब उग्रवाद से मुक्त होने की स्थिति में है। गृह मंत्रालय और पुलिस प्रशासन के अनुसार, अब राज्य में कोई भी बड़ा नक्सली कमांडर सक्रिय नहीं बचा है।
इस अभूतपूर्व सफलता पर डीजीपी तदाशा मिश्र का कहना है कि झारखंड ने नक्सलियों के खात्मे में ऐतिहासिक सफलता हासिल की है। यह झारखंड पुलिस और केंद्रीय सुरक्षा बलों के बेहतरीन तालमेल का नतीजा है।यह बहुत गर्व और संतोष का क्षण है कि राज्य को एक जांबाज पुलिस टीम मिली है। अब वह दिन दूर नहीं जब झारखंड से 'लाल आतंक' की कहानियां पूरी तरह से इतिहास का हिस्सा बन जाएंगी।
कल तक दहशत के अंधेरे में डूबे रहने वाले झारखंड के दूर-दराज़ के क्षेत्रों के लिए यह 15 अगस्त केवल एक तारीख नहीं, बल्कि सचमुच 'आजादी की एक नई भोर' लेकर आया है।
