सुधाकर
किसी भी देश और राज्य के विकास में प्रशासनिक अधिकारियों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। लेकिन क्या आपने किसी ऐसे स्कूल के बारे में सुना है, जिसकी दीवारों से निकलकर सैकड़ों छात्र देश की शीर्ष प्रशासनिक सेवाओं तक पहुँचे हों? झारखंड के लातेहार जिले में पहाड़ियों की गोद में बसा नेतरहाट आवासीय विद्यालय एक ऐसी ही मिसाल है।
इस प्रतिष्ठित संस्थान को लोग प्यार से "भारत की आईएएस फैक्टरी" और "झारखंड का दून स्कूल" भी कहते हैं।आखिर क्या बात है,जो इस स्कूल को देश के बाकी शैक्षणिक संस्थानों से अलग और बेमिसाल बनाती है।
500 से अधिक सिविल सर्वेंट्स की तैयार की फौज
वर्ष 1954 में स्थापित हुए इस विद्यालय का इतिहास गौरवशाली रहा है। स्थापना के बाद से अब तक यहाँ के 500 से भी अधिक छात्र संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) और विभिन्न राज्य लोक सेवा आयोगों की परीक्षाएँ पास कर आईएएस,आईपीएस,आईएफएस डॉक्टर, इंजीनियर, शिक्षक और अन्य शीर्ष पदों पर आसीन हो चुके हैं।देश के कोने-कोने में यहाँ के पूर्व छात्र मुख्य सचिव, गृह सचिव और वरिष्ठ सरकारी अधिकारियों के रूप में अपनी सेवाएँ दे चुके हैं और दे रहे हैं।
नेतरहाट की मिट्टी ने देश को कई रत्न दिए हैं। जिनमें से कुछ प्रमुख नाम भारत के महान और प्रसिद्ध गणितज्ञ वशिष्ठ नारायण सिंह,पद्मश्री डॉ. बिजय प्रकाश (प्रसिद्ध गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट),संजीव कुमार चौधरी,(1977 की सिविल सेवा परीक्षा के टॉपर),अतुल प्रसाद (बिहार लोक सेवा आयोग के पूर्व अध्यक्ष और वरिष्ठ सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी),डॉ. त्रिनाथ मिश्र (पूर्व सीबीआई निदेशक),डॉ. राकेश अस्थाना (पूर्व सीबीआई विशेष निदेशक और दिल्ली पुलिस आयुक्त),अजय सिंह एवं अवनीश शरण(बिहार, झारखंड और छत्तीसगढ़ सहित देश के विभिन्न राज्यों में प्रमुख प्रशासनिक और पुलिस पदों (आईएएस/आईपीएस पर सेवाएं दे रहे हैं),शैलेंद्र नाथ श्रीवास्तव (जाने-माने साहित्यकार, कवि और पूर्व सांसद), शशि भूषण(वरिष्ठ पत्रकार और लेखक, जिन्होंने मीडिया क्षेत्र में पहचान बनाई)
रवींद्र कुमार वर्मा (तकनीकी और कॉर्पोरेट जगत में नेतृत्वकारी भूमिकाओं में रहे), प्रो के के नाग (रांची और विनोबा भावे विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति)और कई पूर्व छात्र (गूगल, माइक्रोसॉफ्ट, इसरोऔर नासा जैसे संस्थानों में भी कार्यरत हैं)शामिल हैं।
सफलता का मूलमंत्र: अनूठी गुरुकेन्द्रित 'गुरुकुल' परंपरा
नेतरहाट विद्यालय की सफलता का राज केवल इसकी किताबों या पाठ्यक्रम में नहीं, बल्कि इसकी गुरुकुल-शैली की जीवन पद्धति में छिपा है। यहाँ छात्र हॉस्टल में नहीं, बल्कि 'आश्रमों' में रहते हैं। वे सादगी, अनुशासन और गांधीवादी विचारों का पालन करते हुए आत्म-निर्भर बनना सीखते हैं। किताबी ज्ञान के अलावा, यहाँ छात्रों को कृषि ,धातु शिल्प और ललित कला जैसे व्यावहारिक विषयों का गहन प्रशिक्षण दिया जाता है। यहाँ छात्रों को अनुशासन थोपा नहीं जाता, बल्कि जीवनशैली के माध्यम से उनके भीतर ढाला जाता है।
नेतरहाट में प्रवेश पाना आसान नहीं है। देश भर के मेधावी छात्र यहाँ दाखिला पाने का सपना देखते हैं। बिहार के जमाने में मैट्रिक का जब रिजल्ट निकलता था, तो टॉप 10नेतरहाट के बच्चे होते थे।हालांकि, झारखंड अलग राज्य बनने के बाद इस विद्यालय के स्तर में थोड़ी गिरावट आई है लेकिन,नेतरहाट आवासीय विद्यालय आज भी यह साबित कर रहा है कि अगर सही मार्गदर्शन, सादगी, समर्पण और सर्वांगीण शिक्षा दी जाए, तो सुदूर ग्रामीण या पहाड़ी इलाकों से भी देश के भावी नायकों और नीति-निर्माताओं को गढ़ा जा सकता है। यह संस्थान आने वाली कई पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बना रहेगा।
