रांची।झारखंड में लगातार गंभीर रूप ले रहे मानव-हाथी टकराव को रोकने के लिए वन विभाग अब अत्याधुनिक आर्टिफिशल इंटेलिजेंस (एआई) और जीआईएस (जियोग्राफिक इनफॉरमेशन सिस्टम) तकनीक का सहारा लेने जा रहा है। इस हाईटेक पहल के तहत हाथियों के पारंपरिक रास्तों (कॉरिडोर) पर विशेष एआई कैमरे लगाए जा रहे हैं, ताकि उनकी आवाजाही की सटीक और रियल-टाइम जानकारी मिल सके। इसके साथ ही सरकार ने प्रभावित परिवारों के लिए मुआवजा राशि को भी ढाई गुना बढ़ा दिया है।
3 किमी पहले मिलेगा अलर्ट, नेटवर्क की समस्या होगी दूर
राज्य के मुख्य वन संरक्षक (वन्य प्राणी) एसआर नटेश के अनुसार पूर्व में एफएम रेडियो के जरिए अलर्ट भेजने जैसी कोशिशें की गई थीं, लेकिन नेटवर्क और सिग्नल की समस्याओं के कारण वे पूरी तरह प्रभावी नहीं रहीं।अब इस नई एआई तकनीक से हाथियों के मूवमेंट की सूचना 3 किलोमीटर पहले ही मिल जाएगी। नेटवर्क से जुड़े ये कैमरे स्थानीय स्तर पर त्वरित सुरक्षा तैयारियों और रियल-टाइम ट्रैकिंग में मददगार साबित होंगे। इन 4 जिलों में सफलता मिलने के बाद इस योजना को पूरे राज्य में लागू किया जाएगा। इसके अलावा रांची के एक युवा शोधकर्ता भी हाथियों के आने से होने वाली हलचल के आधार पर अलर्ट सिस्टम विकसित करने पर रिसर्च कर रहे हैं।
मुआवजा राशि में भारी बढ़ोतरी
हाथियों के हमले में जान गंवाने वाले नागरिकों के प्रति संवेदनशीलता दिखाते हुए राज्य सरकार ने मुआवजा राशि में बड़ा इजाफा किया है।अब पीड़ित परिवारों को ₹4 लाख के स्थान पर ₹10 लाख की सहायता राशि दी जाएगी।
इसके साथ ही घायलों के मुफ्त इलाज और संपत्ति व फसलों के नुकसान पर भी उचित मुआवजा देने का प्रावधान जारी रहेगा।
घायल हाथियों के लिए रेस्क्यू सेंटर
हाथियों के संरक्षण के लिए विभाग ने बीमार और घायल हाथियों के इलाज के लिए रेस्क्यू सेंटर बनाने का काम भी तेज कर दिया है। बेतला और दलमा में ये केंद्र शुरू हो चुके हैं, जबकि चतरा समेत अन्य प्रभावित जिलों में भी इन्हें स्थापित करने की तैयारी चल रही है।
5 साल में 400 से अधिक मौतें
बढ़ते शहरीकरण, जंगलों में मानवीय अतिक्रमण, अनियंत्रित खनन और भोजन-पानी की कमी के कारण हाथी अक्सर रिहायशी इलाकों का रुख कर रहे हैं। वन विभाग के आंकड़ों के अनुसार
पिछले 15 से 20 वर्षों में लगभग 1500 लोग अपनी जान गंवा चुके हैं।केवल पिछले 5 वर्षों में ही 400 से अधिक लोगों की मौत हुई है।सबसे प्रभावित जिलों में चाईबासा, रांची, रामगढ़, हजारीबाग और पश्चिमी सिंहभूम शामिल हैं।
इस गंभीर त्रासदी को रोकने और जान-माल की रक्षा करने में यह हाईटेक एआई तकनीक और रेस्क्यू सेंटर्स की पहल बेहद निर्णायक साबित हो सकती है।
