अजय शर्मा
खूंटी।ओलंपियन हॉकी खिलाड़ी निक्की प्रधान के पैतृक गांव हेसेल की गलियों में इन दिनों एक मासूम की चंचलता हर किसी का ध्यान खींच रही है। 11 वर्षीय मुक्ति डुंगडुंग के एक पैर में लोहे की भारी बेड़ी और ताला जड़ा है। कदम भले ही जंजीरों से बंधे हों, लेकिन उसकी मासूम मुस्कान और खिलखिलाहट को यह बेड़ी कैद नहीं कर सकी है। गांव की गलियों में अपनी बहन के साथ बेफिक्र दौड़ती मुक्ति का चेहरा यही बयां करता है कि इरादे आजाद हों तो बचपन को बांधना इतना आसान नहीं होता।
पेलौल स्कूल में पढ़ने वाली मुक्ति का परिवार बेहद विषम परिस्थितियों से गुजर रहा है। उसके पिता बिरसा मुंडा खुद दिव्यांग हैं और परिवार में पत्नी जौनी देवी के अलावा चार बेटियां हैं। मां जौनी देवी का कहना है कि पति के अत्यधिक शराब सेवन के कारण घर का माहौल तनावपूर्ण रहता है।
दूसरी ओर, बच्ची के पैर में बेड़ी डालने को लेकर पिता का अपना ही तर्क है। उनका कहना है कि मुक्ति बहुत तेज भागती है और गांव के कुएं या तालाब में गिरकर किसी अनहोनी का शिकार न हो जाए, इसलिए उन्होंने उसकी रफ्तार को रोकने के लिए यह कदम उठाया है। गांव के कृष्णा मुंडू बताते हैं कि ग्रामीणों ने कई बार पिता को समझाने और बेड़ी खोलने की कोशिश की, लेकिन बिरसा मुंडा सुरक्षा का सवाल उठाकर किसी की नहीं सुनते।
इस दर्दभरी कहानी में उम्मीद का एक सिरा उसकी शिक्षा से जुड़ता है। मां जौनी देवी बताती हैं कि जब मुक्ति गांव के अन्य बच्चों के साथ स्कूल जाने लगती है, तब पिता उसके पैर की बेड़ी खोल देते हैं। यानी जब-जब वह कलम थामने निकलती है, उसके कदम आजाद हो जाते हैं। हालांकि, स्कूल से लौटते ही लोहे की ठंडी जंजीर फिर से उसके पैरों को जकड़ लेती है।
स्कूल से जुड़े शिक्षक संजय मांझी और सुजय मांझी बताते हैं कि जब बच्ची उनके घर आती है, तो वे उसे प्यार से खिला-पिलाकर घर भेज देते हैं। पिता के उग्र स्वभाव और विवाद के डर से कोई भी जबरन बेड़ी काटने की हिम्मत नहीं जुटा पाता।
यह कहानी सिर्फ एक बच्ची के पैर में बंधी लोहे की जंजीर की नहीं, बल्कि उन परिस्थितियों की है जहां सुरक्षा का डर एक मासूम के बुनियादी अधिकारों पर भारी पड़ रहा है। जिस गांव ने देश को निक्की प्रधान जैसी अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी दी, आज उसी हेसेल गांव के लोग चाहते हैं कि नन्हीं मुक्ति को भी इस लोहे की कैद से हमेशा के लिए आजादी मिले, ताकि वह भी बेफिक्र होकर एक सामान्य बचपन जी सके।
