सुधाकर
महालेखाकार (सीएजी) द्वारा झारखंड सरकार के वित्तीय वर्ष 2024-25 के राज्य वित्त लेखापरीक्षा प्रतिवेदन में राज्य के बजट प्रबंधन, अधिक व्यय (Excess Expenditure) और अनावश्यक अनुपूरक अनुदानों (Unnecessary Supplementary Grants) को लेकर गंभीर चिंताएं व्यक्त की गई हैं। रिपोर्ट के अनुसार राज्य की संचित निधि से व्यय पर विधायी निगरानी (Legislative Control) को मजबूत करने के लिए वित्तीय अनुशासनहीनता पर लगाम लगाना बेहद जरूरी है।
लेखापरीक्षा से यह बात सामने आई है कि पिछले कुछ वर्षों के दौरान प्रमुख रूप से विनियोग संख्या 13, 14 और अनुदान संख्या 15 के तहत लगातार भारी आधिक्य व्यय किया गया है।
पेंशन पर आधिक्य (अनुदान संख्या 15): मुख्य शीर्ष 2071 (पेंशन और अन्य सेवानिवृत्ति लाभ) के तहत वित्तीय वर्ष 2021-22 में 189.97 करोड़ रुपये, 2023-24 में 268.02 करोड़ रुपये और 2024-25 में 306.62 करोड़ रुपये का अतिरिक्त व्यय दर्ज किया गया।
ब्याज अदायगी (विनियोग संख्या): वर्ष 2020-21 और 2021-22 के दौरान क्रमशः 144.95 करोड़ रुपये और 98.89 करोड़ रुपये का आधिक्य मुख्य रूप से ब्लॉक ऋणों, अन्य गैर-योजना मदों और ग्रामीण विद्युतीकरण निगम से लिए गए ऋणों के ब्याज भुगतान के कारण हुआ।
विधायी नियमन का अभाव: लोक लेखा समिति (पीएसी) की सिफारिशों पर वर्ष 2010-11 तक 8,120.12 करोड़ रुपये की राशि के आधिक्य व्यय को विनियमित किया गया था (13 जनवरी 2014)। इसके बाद,पीएसी द्वारा सिफारिशों के अभाव के कारण हाल के वर्षों के प्रावधानों पर आधिक्य व्यय को विधिवत नियमित नहीं किया गया है। कुल आधिक्य व्यय बढ़कर 4,046.43 करोड़ रुपये तक पहुंच गया है।
अनावश्यक एवं परिहार्य अनुपूरक प्रावधान
झारखंड बजट नियमावली (नियम 117 और 57) के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद, वास्तविक आवश्यकता का सटीक आकलन किए बिना बड़े पैमाने पर अनुपूरक बजट के प्रस्ताव वित्त विभाग को भेजे गए।
अप्रयुक्त अनुपूरक प्रावधान: वर्ष 2024-25 के दौरान कुल 46 मामलों में 5,407.00 करोड़ रुपये के अनुपूरक प्रावधान किए जाने के बावजूद वास्तविक व्यय मूल प्रावधानों तक भी नहीं पहुंच पाया। इसके अलावा, 16 मामलों में 16,122.96 करोड़ रुपये के अनुपूरक प्रावधान (प्रत्येक मामले में 2 करोड़ रुपये से अधिक) पूरी तरह व्यर्थ साबित हुए क्योंकि इनकी संपूर्ण राशि का उपयोग नहीं किया जा सका।
प्रमुख विभागों में वित्तीय कुप्रबंधन
लेखापरीक्षा रिपोर्ट में महत्वपूर्ण विभागों के कामकाज की पोल खोली गई है जहाँ मूल बजट का पूर्ण उपयोग न होने के बावजूद अतिरिक्त अनुपूरक राशियां जारी कर दी गईं।
स्वास्थ्य, चिकित्सा शिक्षा एवं परिवार कल्याण विभाग (अनुदान संख्या 20): वित्तीय वर्ष 2024-25 के दौरान इस विभाग ने 16 योजनाओं के तहत 1,610.33 करोड़ रुपये के कुल प्रावधान में से केवल 1,258.12 करोड़ रुपये का ही उपयोग किया, जिससे 352.21 करोड़ रुपये की भारी बचत हुई। इसके बावजूद, बजट नियमावली का उल्लंघन करते हुए अनुपूरक बजट के जरिए इन योजनाओं को 144.77 करोड़ रुपये की अतिरिक्त धनराशि और दे दी गई।
अनुसूचित जनजाति, अनुसूचित जाति, अल्पसंख्यक एवं पिछड़ा वर्ग कल्याण विभाग (अनुदान संख्या 51): इस विभाग ने 2024-25 के दौरान 8 योजनाओं में 231.61 करोड़ रुपये के मूल प्रावधान में से केवल 197.00 करोड़ रुपये का उपयोग किया, जिससे 34.61 करोड़ रुपये की बचत दर्ज की गई। मूल राशि बचने के बावजूद, अनुपूरक माध्यम से इन योजनाओं (जैसे साइकिल वितरण योजना, प्री-मैट्रिक छात्रवृत्ति आदि) के लिए 21.83 करोड़ रुपये का अतिरिक्त प्रावधान कर दिया गया।
सरकार की प्रतिक्रिया एवं आगे की राह
मामले की गंभीरता को देखते हुए राज्य सरकार ने 25 नवंबर 2025 को आश्वासन दिया है कि भविष्य में बजट आकलन, निगरानी तथा वित्तीय नियंत्रण तंत्र को और अधिक मजबूत किया जाएगा।
महालेखाकार की रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि राज्य में वित्तीय अनुशासन बनाए रखने और संचित निधि से होने वाले खर्चों पर विधायी निगरानी को प्रभावी बनाने के लिए यह आवश्यक है कि इस प्रकार के आधिक्य व्यय और बिना सोचे-समझे लिए जाने वाले अनुपूरक अनुदानों की पुनरावृत्ति को तत्काल रोका जाए तथा लंबित आधिक्य व्ययों को कानूनी प्रक्रिया के तहत नियमित किया जाए।
