सुधाकर

​रांची। झारखंड विधानसभा की सबसे महत्वपूर्ण समितियों में शुमार 'लोक लेखा समिति' (पीएसी) की कार्यप्रणाली और उसकी प्रभावशीलता पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। एक ओर राज्य में अरबों रुपये के वित्तीय घपले, बिना अनुमति भारी-भरकम अतिरिक्त व्यय और लाखों करोड़ के लंबित उपयोगिता प्रमाण पत्रों का अंबार लगा हुआ है, वहीं दूसरी ओर समिति इन ज्वलंत वित्तीय अनियमिताओं पर प्रभावी लगाम लगाने में निष्क्रिय नजर आ रही है।

​विधानसभा की इस 'लघु सदन' रूपी समिति का मुख्य संवैधानिक और नियमानुकूल दायित्व महालेखाकार (सीएजी) के प्रतिवेदनों पर गहराई से छानबीन करना और विभागीय अधिकारियों से जवाब तलब कर सदन को रिपोर्ट सौंपना है। लेकिन पिछले 25 वर्षों से लगातार जारी अनियंत्रित वित्तीय परिदृश्य यह साबित करता है कि लोकधन पर विधायिका का प्रभावी नियंत्रण कमजोर पड़ता जा रहा है।

​वित्तीय अराजकता की चौंकाने वाली तस्वीर

​सीएजी के प्रतिवेदनों से उजागर आंकड़े राज्य में पसरी वित्तीय अव्यवस्था और प्रशासनिक उदासीनता को स्पष्ट रूप से बयां करते हैं।

​बिना अनुमति अरबों का अतिरिक्त व्यय: वित्तीय वर्ष 2024-2025 तक बिना विधानसभा की स्वीकृति के किया गया अरबों रुपये का अतिरिक्त व्यय (Excess Expenditure) पीएसी के पास विचार के लिए लंबित है। यह आंकड़ा साल 2014 में सरकार द्वारा नियमित किए गए 8,120 करोड़ रुपये के अतिरिक्त व्यय से बिल्कुल अलग है। बिना विधायिका की मंजूरी के प्रावधान से अधिक राशि खर्च करना सीधे तौर पर गंभीर वित्तीय अनियमितता है।

​सालों से अटका अग्रिम का हिसाब: मार्च 2024 तक 18,011 मामलों में कुल 4,891.72 करोड़ रुपये का अग्रिम भुगतान लंबित पड़ा है, जिसका आज तक समायोजन नहीं किया गया है।

​लापता उपयोगिता प्रमाण पत्र: मार्च 2024 तक विभिन्न विभागों द्वारा 47,367 मामलों में 1,33,161.50 करोड़ रुपये के उपयोगिता प्रमाण पत्रमहालेखाकार को सौंपे ही नहीं गए हैं। इतनी बड़ी राशि का हिसाब-किताब गायब होना राज्य की आर्थिक प्रणाली पर बड़ा प्रश्नचिह्न लगाता है।

​क्या कहते हैं नियम और संवैधानिक प्रावधान?

​विधानसभा संचालन के नियमों (विशेषकर नियम 237 एवं 238) के स्पष्ट प्रावधानों के अनुसार, लोक लेखा समिति का मुख्य कार्य राज्य के विनियोग लेखों (Appropriation Accounts), वित्त लेखों (Finance Accounts) और सीएजी के प्रतिवेदनों की विस्तृत छानबीन करना है। जब सभा की बैठकें नहीं चल रही होती हैं, तब यह समिति लघु सदन के रूप में कार्य करती है और वित्तीय अनियमितताओं पर कड़ा रुख अपनाते हुए यथोचित कार्रवाई की अनुशंसा करने का अधिकार रखती है।

​बावजूद इसके, सैकड़ों आपत्ति कंडिकाओं के वर्षों से लंबित रहने और दोषियों पर ठोस कार्रवाई न होने से यह स्पष्ट है कि नियम कागजों तक सीमित रह गए हैं और समिति का प्रभावी हस्तक्षेप धरातल पर नजर नहीं आ रहा है।