बोकारो। वर्ष 1965 में तत्कालीन बिहार के मुख्यमंत्री श्रीकृष्ण सिंह के अथक प्रयासों से पुरुलिया की जगह बोकारो में स्टील प्लांट स्थापित करने का निर्णय लिया गया। 1968 में इसका निर्माण शुरू हुआ और नाम पड़ा—'बोकारो स्टील लिमिटेड' (बीएसएल), जो 1971 में भारतीय इस्पात प्राधिकरण (सेल) की एक प्रमुख इकाई बन गया।
पर्याप्त जमीन, पानी, बिजली, कोयला और लौह अयस्क जैसी अनुकूल परिस्थितियों के बावजूद, 60 वर्षों के बाद भी बोकारो स्टील का वार्षिक उत्पादन केवल 5.8 मिलियन टन तक ही पहुंच सका है, जबकि इसकी मूल योजना 10 मिलियन टन उत्पादन की थी। शुरुआत में किसी ठोस पुनर्वास व विस्थापन नीति का न होना, जमीनों का अधूरा उपयोग और शहर का नकारात्मक माहौल आज भी इस प्लांट के विकास में सबसे बड़ी बाधा बना हुआ है।
सेल की अन्य प्रमुख इकाइयों और बोकारो के बीच का अंतर स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है।
1. राउरकेला स्टील प्लांट
स्थापना व क्षमता:1950 के दशक में स्थापित देश का पहला एकीकृत इस्पात संयंत्र, क्षमता: 4.5 मिलियन टन/वर्ष।
जमीन व विस्थापन: 30,000 एकड़ जमीन पर 13,000 परिवार (31 गाँव, जिनमें 47% आदिवासी/गरीब) विस्थापित हुए।
रोजगार व औद्योगिक विकास: लगभग 6,500 विस्थापितों को प्रत्यक्ष नौकरी मिली। वर्तमान में संयंत्र के आसपास 6 औद्योगिक क्षेत्र विकसित हैं, जहाँ लगभग 1,000,000 (1 लाख) लोग प्रत्यक्ष रूप से छोटे और सहयोगी उद्योगों में कार्यरत हैं।
2. दुर्गापुर स्टील प्लांट
स्थापना व क्षमता: 1950 के दशक में शुरू, स्पेशल स्टील उत्पादन क्षमता: 2.5 मिलियन टन।
पुनर्वास मॉडल: राज्य सरकार द्वारा पुनर्वास कॉलोनियों का निर्माण किया गया। कई गाँवों को खाली कराए बिना केवल कृषि भूमि अधिग्रहित की गई।
सहायक उद्योग: 2,000 से अधिक परिवारों को स्थायी नौकरी मिली। आज आसनसोल और रानीगंज क्षेत्र में 500 से अधिक औद्योगिक इकाइयां (एमएसएमई) हैं, जिससे रोजगार की अपार संभावनाएँ बनी हुई हैं।
3. भिलाई स्टील प्लांट
स्थापना व क्षमता: 1955 में स्थापित, उत्पादन क्षमता: 7 मिलियन टन।
विस्थापन व पुनर्वास: 22,392 एकड़ जमीन अधिग्रहित कर 5,600 विस्थापित परिवारों में से 4,468 को नौकरी दी गई। 96 गाँवों के किसानों को खेती के लिए अतिरिक्त 24,000 एकड़ उपजाऊ भूमि प्रदान की गई।
सहायक उद्योग: 6 से अधिक औद्योगिक क्षेत्रों (लाइट व हैवी इंडस्ट्रीज) के माध्यम से स्टील प्रोसेसिंग यूनिट्स की भरमार है, जहाँ 1,000,000 (1 लाख) से अधिक लोग गैर-प्लांट रोजगार में कार्यरत हैं।
बोकारो में 64 गाँवों/मौजों के 2,019 परिवारों से 31,247 एकड़ जमीन ली गई। प्रथम पीढ़ी के 16,000 लोगों को नौकरी दी गई, लेकिन वास्तविक प्रयोग सिर्फ 19,147 एकड़ जमीन का ही हुआ। बाकी 12,000 एकड़ से अधिक जमीन खाली पड़ी है, जिस पर या तो मूल निवासियों का कब्ज़ा है या अतिक्रमण हो चुका है।
बोकारो में केवल एक औद्योगिक क्षेत्र विकसित हो सका, जिससे महज 8,000 लोगों को ही रोजगार मिल पाया। अप्रत्यक्ष रोजगार भी 20-25 हजार तक सीमित रह गया।
एक तरफ गर्गा नदी, दूसरी तरफ दामोदर, दो रेल लाइनें और गर्गा डैम होने के कारण टाउनशिप और आसपास के क्षेत्रों का निर्बाध विकास नहीं हो पाया। सिटी सेंटर, सेक्टर मार्केट व नेबरहुड बाजारों का एकीकृत विकास न होने से पुरुलिया, झालदा और धनबाद से आए व्यापारियों को घोर निराशा हाथ लगी।
पूर्व इस्पात मंत्री स्व. बीजू पटनायक के समय स्थानीय जनप्रतिनिधियों के फैसलों के कारण 10 मिलियन टन का लक्ष्य घटकर 5 मिलियन टन पर ही सीमित रह गया। इसके कारण सहयोगी एमएसएमई इकाइयों को कार्य आदेश मिलना बंद हो गए, लगी हुई इकाइयाँ बंद होने लगीं और उद्यमी बोकारो से पलायन करने को मजबूर हो गए।
वर्तमान में वैश्विक स्तर पर इस्पात उद्योग आउटसोर्सिंग और निजी क्षेत्र के दबदबे पर आधारित है। निजी कंपनियों के साथ दैनिक मूल्य उतार-चढ़ाव के बीच प्रतिस्पर्धा में बने रहना और मैनपावर खर्च को नियंत्रित करना सरकारी कंपनियों के लिए सबसे बड़ी चुनौती है।
जर्मनी में एक 10 मिलियन टन क्षमता वाली स्टील कंपनी मात्र 500 कर्मचारियों के बल पर संचालित होती है।
सेल में बोकारो स्टील प्लांट का उत्पादन खर्च अपेक्षाकृत सबसे कम है, लेकिन रोजगार के अवसर घटने लगे हैं। फिलहाल बीएसएल में नियमित कर्मचारी लगभग 7,000 ही रह गए हैं। सेल मुख्यालय ने ठेका मजदूरों की संख्या में भी कटौती का लक्ष्य दिया है।
कुल मिलाकर, स्थापना के समय पारदर्शी व ठोस विस्थापन नीति का न होना, 10 मिलियन टन विस्तार योजना का रुकना और शहर का नकारात्मक माहौल बोकारो के पिछड़ने का मुख्य कारण बना। विस्थापित केवल वे नहीं हैं जिनकी जमीनें गईं, बल्कि वे छोटे व्यापारी और उद्यमी भी विस्थापित हो चुके हैं जिन्होंने जीवन भर की पूंजी यहाँ लगाई थी। यदि समय रहते बोकारो के एमएसएमई क्षेत्र और औद्योगिक माहौल को पुनर्जीवित नहीं किया गया, तो शहर और राज्य दोनों पर इसका गंभीर आर्थिक प्रभाव पड़ेगा।
