बंदगांव (प सिंहभूम)। कभी बंदूक और नक्सलवाद की राह पर चलने वाले मसीह चरण पुर्ती अब अपने गांव में बदलाव की नई इबारत लिख रहे हैं। जीवन के 21 साल संघर्ष, गलत फैसलों और जेल की सलाखों के पीछे बिताने के बाद अब उनका मकसद पूरी तरह बदल चुका है। वे पश्चिमी सिंहभूम जिले के बंदगांव प्रखंड स्थित श्रीजंग गांव में गरीबी से लड़ने, युवाओं को रोजगार से जोड़ने और अशिक्षा दूर करने की मुहिम में जुटे हैं।

मसीह चरण पुर्ती के अनुसार सरकारी उपेक्षा और भूमि विवाद जैसे कारणों से वे नक्सलवाद की ओर बढ़े थे। सात वर्षों तक भाकपा (माओवादी) और पीएलएफआई जैसे संगठनों से जुड़े रहने के बाद उन्हें 14 साल जेल में बिताने पड़े। जेल से बाहर आने पर जब उन्होंने गांव में गरीबी, पलायन, अफीम की खेती की ओर बढ़ते युवाओं और ग्रामीणों में एकजुटता की कमी देखी, तो उन्होंने समाज सुधार का संकल्प लिया। उन्होंने तय किया कि बदलाव का रास्ता बंदूक नहीं, बल्कि खेती, शिक्षा और सामूहिक प्रयास हैं। गांव को गरीबी से उबारने के लिए मसीह ने सामूहिक खेती की शुरुआत की है।

'आत्मा' (प सिंहभूम) के सहयोग से मिले पौधों के जरिए लगभग एक एकड़ जमीन पर गेंदा फूल लगाए गए हैं। ग्रामीणों ने अपने निजी संसाधनों से पांच एकड़ भूमि पर सरसों की खेती शुरू की है। उनकी इस पहल से प्रेरित होकर गांव के अन्य लोग भी अपनी खाली पड़ी जमीनों पर खेती करने के लिए आगे आ रहे हैं।

निजी खर्च पर चला रहे स्कूल, 15 बच्चों को दे रहे शिक्षा

खेती के साथ-साथ मसीह चरण पुर्ती अगली पीढ़ी के भविष्य को संवारने में लगे हैं। उन्होंने अपने निजी खर्च पर गांव में एक स्कूल शुरू किया है, जहां 15 बच्चे नियमित रूप से शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। स्कूल के संचालन का पूरा खर्च वे स्वयं उठाते हैं।

ग्रामीणों को एकजुट कर अफीम जैसी अवैध गतिविधियों से दूर रखने और आजीविका मजबूत करने की यह पहल एक मिसाल बनकर उभरी है। हालांकि, सीमित संसाधनों के कारण इसे बड़े स्तर पर ले जाना चुनौतीपूर्ण है। गेंदा और सरसों की खेती को विस्तार देने, कृषि उपकरण, तकनीकी मार्गदर्शन और स्कूल के संचालन के लिए अब सरकारी योजनाओं व प्रशासनिक सहयोग की बेहद जरूरत है।