​रांची। झारखंड हाईकोर्ट ने आजीवन कारावास की सजा काट रहे अनिल शर्मा की समयपूर्व रिहाई के मामले में एक अहम फैसला सुनाया है। जस्टिस रोंगोन मुखोपाध्याय की अदालत ने 25 मार्च 2026 को स्टेट सेंटेंस रिव्यू बोर्ड की ओर से उनकी रिहाई की मांग खारिज करने वाले आदेश को रद्द कर दिया है। अदालत ने मामले को दोबारा विचार के लिए बोर्ड के पास भेजते हुए विस्तृत और कारणों के साथ नया आदेश पारित करने का निर्देश दिया है। इस फैसले से अनिल शर्मा की समयपूर्व रिहाई की मांग पर एक बार फिर विचार होने का रास्ता साफ हो गया है। हालांकि, हाईकोर्ट ने उन्हें तत्काल रिहा करने का आदेश नहीं दिया है।

​अनिल शर्मा ने झारखंड हाईकोर्ट में क्रिमिनल रिट याचिका (संख्या 307/2026) दायर कर समयपूर्व रिहाई की मांग खारिज करने वाली अधिसूचना को चुनौती दी थी। मामले की लंबी सुनवाई के बाद अदालत ने 13 अक्टूबर 2026 को अपना फैसला सुनाया।

​अनिल शर्मा को वर्ष 1999 के लोअर बाजार थाना कांड संख्या 12/99 में जेल के एक बंदी सुधीर सिंह उर्फ भोमा की हत्या के मामले में दोषी ठहराया गया था। ट्रायल कोर्ट ने 22 मार्च 2002 को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 302/34 और 307/34 के तहत दोषी करार देते हुए मृत्युदंड की सजा सुनाई थी। इसके बाद ​29 नवंबर 2002 को हाईकोर्ट ने मृत्युदंड की सजा को आजीवन कारावास में बदल दिया।

​30 अप्रैल 2004 को सुप्रीम कोर्ट ने भी उनकी अपील खारिज कर दी।

​अदालत के रिकॉर्ड के अनुसार अनिल शर्मा जेल में 26 साल से अधिक की वास्तविक कैद और छूट सहित करीब 29 साल की अवधि गुजार चुके हैं।

​इससे पहले स्टेट सेंटेंस रिव्यू बोर्ड ने कई बार अनिल शर्मा की रिहाई की मांग को खारिज किया था। बोर्ड ने इसके पीछे जेल में दूसरे बंदी की हत्या, रिहाई के बाद गैंगवार की आशंका, सार्वजनिक शांति भंग होने की संभावना और न्यायिक हिरासत से पहले उनके फरार होने की घटना को मुख्य आधार बनाया था। इससे पहले हाईकोर्ट ने 19 अक्टूबर 2022 को भी मामले को दोबारा विचार के लिए बोर्ड के पास भेजा था, लेकिन इसके बावजूद 22 जून 2023, 14 अगस्त 2024, 19 फरवरी 2025 और 1 सितंबर 2025 को उनकी रिहाई की मांग खारिज कर दी गई। इसके बाद 25 मार्च 2026 के आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई थी।

​सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वरीय अधिवक्ता अजीत कुमार ने दलील दी कि अनिल शर्मा 1984 की बिहार सरकार की नीति के तहत समयपूर्व रिहाई के पात्र हैं। इस नीति के अनुसार 14 साल की वास्तविक कैद और रिमिशन सहित कुल 20 साल की अवधि पूरी होने के बाद मामले पर विचार किया जाना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि झारखंड राज्य की नई नीति के तहत भी वह निर्धारित अवधि से काफी अधिक समय जेल में बिता चुके हैं।

​वहीं, राज्य सरकार की ओर से इसका विरोध करते हुए कहा गया कि अनिल शर्मा की समयपूर्व रिहाई से क्षेत्र में गैंगवार और सार्वजनिक शांति भंग होने का गंभीर खतरा है। सरकार का तर्क था कि निर्धारित अवधि पूरी कर लेने मात्र से किसी कैदी को स्वतः रिहाई का कानूनी अधिकार नहीं मिल जाता, और इस पर अंतिम निर्णय लेने का अधिकार पूरी तरह से स्टेट सेंटेंस रिव्यू बोर्ड के पास सुरक्षित है।