बोकारो। बोकारो स्टील प्लांट (बीएसएल) के परिचालन और उत्पादन में ठेका मजदूरों का योगदान बेहद महत्वपूर्ण है। एक तरह से पूरा प्लांट इन्हीं के भरोसे चल रहा है, लेकिन मानदेय और बोनस देने के वक्त इन्हें दरकिनार कर दिया जाता है। इस उपेक्षा से हजारों ठेका मजदूरों में भारी हताशा और निराशा है।

हाल ही में स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड (सेल) के नियमित कामगारों का बोनस समझौता संपन्न हुआ है। इसके तहत नियमित कर्मचारियों को ₹32,000 और प्रशिक्षुओं (ट्रेनी) को ₹26,500 मिलेंगे, जिसका भुगतान दुर्गा पूजा से पहले कर दिया जाएगा। बोकारो स्टील प्लांट में नियमित कर्मचारियों की संख्या जहां लगभग 7,600 है, वहीं ठेका मजदूरों की संख्या 40,000 से भी अधिक है। साफ है कि उत्पादन का असली आधार स्तंभ यही मजदूर हैं, लेकिन बोनस वार्ता में भाग ले रहे पांचों राष्ट्रीय श्रमिक संगठनों (यूनियनों) और प्रबंधन ने इनके बोनस पर चर्चा करना भी उचित नहीं समझा।

केन्द्र सरकार के नए चार श्रम कानूनों के लागू होने के बाद ठेका मजदूरों की स्थिति और अधिक दयनीय हो गई है। पहले प्रावधान था कि ठेकेदार बदलने के बावजूद मजदूर वही रहते थे। लेकिन, अब ठेकेदारों को यह अधिकार मिल गया है कि वे अपनी मर्जी से किसी को भी काम पर रख या हटा सकते हैं। पुराने मजदूरों को काम पर बनाए रखने की बाध्यता खत्म होने से उनके सिर पर हमेशा छंटनी की तलवार लटकी रहती है।

कागजों पर तो भारत सरकार व राज्य सरकार द्वारा निर्धारित न्यूनतम मजदूरी मजदूरों के बैंक खातों में भेज दी जाती है, लेकिन हकीकत कुछ और ही है। आरोप है कि ठेकेदार मजदूरों के पास से एटीएम कार्ड या पहले से हस्ताक्षरित चेकबुक जमा करवा लेते हैं। वेतन आते ही हर मजदूर के खाते से लगभग ₹5,000 की निकासी कर ली जाती है। मजदूरों का कहना है कि इस कटमनी में संबंधित अधिकारियों की भी मिलीभगत रहती है। काम से निकाले जाने के डर से मजदूर खुलकर विरोध भी नहीं कर पाते।

स्थानीय मजदूरों का कहना है कि अधिकांश मजदूर संगठन दिखावे के लिए आंदोलन जरूर करते हैं, लेकिन अंत में उनका समझौता ठेकेदारों से ही हो जाता है। मजदूर यूनियनों के लिए ये केवल 'नेतागिरी की फैक्ट्री का कच्चा माल' और भीड़ जुटाने का जरिया बनकर रह गए हैं। उल्लेखनीय है कि बोकारो स्टील में कार्यरत ठेका मजदूरों में से अधिकांश बोकारो के स्थानीय निवासी या झारखंड के आदिवासी समाज से आते हैं, लेकिन इसके बावजूद उनके हक और सुविधाओं की सुध लेने वाला कोई नहीं है।