जमशेदपुर/सरायकेला। सरायकेला के रहने वाले मृत्युंजय पोद्दार की कहानी संघर्ष, हौसले और आत्मनिर्भरता की अनोखी मिसाल है। बचपन से पोलियो की विभीषिका झेल रहे मृत्युंजय ने शारीरिक और आर्थिक तंगी के बावजूद हार नहीं मानी और किताबों को ही अपनी जिंदगी का आधार बना लिया। वर्ष 2018 से लेखन की शुरुआत करने वाले मृत्युंजय अब तक 8 किताबें लिख चुके हैं।

उनकी किताबों में समाज, संघर्ष और जीवन की व्यावहारिक परिस्थितियों का ताना-बाना बुना गया है। मृत्युंजय का कहना है कि लिखना उनके लिए महज एक शौक नहीं, बल्कि अपने अस्तित्व की लड़ाई और समाज तक अपनी बात पहुंचाने का सशक्त माध्यम है।

वर्ष 2024 में मृत्युंजय सरायकेला छोड़कर जमशेदपुर आ गए। अपनी गुजर-बसर के लिए वे शहर की सड़कों के किनारे खुद की लिखी किताबें बेचने लगे। हालांकि उनकी पुस्तकें ऑनलाइन प्लेटफॉर्म 'अमेजन' पर भी उपलब्ध हैं, लेकिन वहां से मिलने वाली सीमित आय के कारण उन्हें फुटपाथ पर उतरना पड़ा। शारीरिक दिक्कतों के साथ-साथ सिर पर चढ़ा कर्ज उनकी राह को और कठिन बना रहा है।

फिलहाल मृत्युंजय जमशेदपुर न्यू कोर्ट के पास स्थित एक शेल्टर होम में रह रहे हैं। उन्होंने अपनी परेशानियों को लेकर कई विधायकों, सांसदों और स्थानीय जनप्रतिनिधियों का दरवाजा खटखटाया, लेकिन अब तक उन्हें केवल आश्वासन ही मिले हैं, कोई स्थायी समाधान नहीं हो सका।

सड़क किनारे किताबों की बिक्री से होने वाली मामूली कमाई से वे अपने दैनिक खर्च चलाने और कर्ज चुकाने की हर संभव कोशिश कर रहे हैं। मृत्युंजय कहते हैं कि वे किसी के सामने हाथ फैलाने के बजाय अपनी मेहनत के दम पर अपनी जिम्मेदारियां पूरी करना चाहते हैं।

मृत्युंजय की यह स्थिति दिव्यांगजनों के लिए चलाई जा रही सरकारी योजनाओं और उनकी जमीनी हकीकत के अंतर को उजागर करती है। समाज को अपनी किताबों के जरिए आईना दिखाने वाले इस लेखक को आज किसी दान की नहीं, बल्कि एक ऐसे स्थायी और सम्मानजनक सहारे की दरकार है, जिससे वे अपना लेखन जारी रख सकें। अब देखना यह है कि प्रशासन और सरकार की नजर इस स्वाभिमानी लेखक पर कब पड़ती है।