जमशेदपुर। झारखंड की आदिवासी नेत्री एवं सामाजिक कार्यकर्ता स्वर्गीय निशा कुमारी भगत की आत्महत्या की खबर अत्यंत दुखद, पीड़ादायक और झकझोर देने वाली है। यह घटना केवल एक महिला की असमय मृत्यु नहीं है, बल्कि झारखंड की प्रशासनिक व्यवस्था, कानून-व्यवस्था और आदिवासी समाज के अधिकारों की सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े करती है। उपरोक्त बातें राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री रघुवर दास ने कही। शनिवार को राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री रघुवर दास ने गुमला के चैनपुर प्रखंड पहुंचकर दिवंगत निशा भगत के अंतिम यात्रा (मिट्टी कार्यक्रम) में शामिल होकर श्रद्धाजंलि दी एवं पुण्यात्मा के शांति की प्रार्थना की। इस दौरान उन्होंने शोक संतप्त परिवारजनों से भी मुलाकात शोक संवेदना व्यक्त की और उनका ढांढस बंधाया।
मीडिया से बात करते हुए पूर्व मुख्यमंत्री रघुवर दास ने कहा कि निशा भगत ने अपने अंतिम वीडियो में जिस तरह राज्य सरकार, पुलिस-प्रशासन और जमीन माफियाओं पर प्रताड़ित करने के आरोप लगाए, वे बेहद गंभीर हैं। उनके आरोपों की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। यदि एक आदिवासी महिला अपनी जमीन, अपनी संस्कृति और अपने समाज के अधिकारों की लड़ाई लड़ते हुए खुद को इतना असहाय महसूस करने लगे कि उसे अपनी जान देनी पड़े, तो यह पूरे शासन-प्रशासन के लिए शर्मनाक स्थिति है।
निशा भगत सरना-सनातन संस्कृति, आदिवासी अस्मिता, परंपराओं और जल-जंगल-जमीन की रक्षा के लिए संघर्ष कर रही थीं। उनका संघर्ष व्यक्तिगत नहीं था। यह संघर्ष आदिवासी समाज के अस्तित्व, सम्मान और अधिकारों से जुड़ा हुआ था।
आदिवासी समाज के आरक्षण, धार्मिक पहचान और सांस्कृतिक अधिकारों से जुड़े विषयों पर भी गंभीर एवं निष्पक्ष बहस की आवश्यकता है। आरक्षण व्यवस्था और उसके लाभार्थियों से संबंधित सवालों का समाधान संवैधानिक प्रावधानों एवं ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर होना चाहिए। आदिवासी समाज के वास्तविक अधिकारों और हितों की रक्षा सर्वोपरि होनी चाहिए।
आज सवाल यह है कि आखिर आदिवासी समाज की जमीन पर अवैध कब्जे की शिकायतों को लेकर प्रशासन गंभीर क्यों नहीं है? जमीन माफियाओं के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं हो रही है? निशा भगत द्वारा लगाए गए आरोपों पर समय रहते प्रभावी कार्रवाई क्यों नहीं की गई?
मैं झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से मांग करता हूं कि इस पूरे प्रकरण की निष्पक्ष एवं समयबद्ध सीबीआई जांच कराई जाए। निशा भगत ने अपने अंतिम वीडियो में जिन लोगों और अधिकारियों पर आरोप लगाए हैं, उनकी भूमिका की जांच हो तथा दोषी पाए जाने वालों के खिलाफ कठोरतम कानूनी कार्रवाई की जाए।
झारखंड के मुख्यमंत्री स्वयं जमीन घुटाले में आरोपित है इसलिए झारखंड की जानता को इनपर विश्वास नहीं है। इसलिए झारखंड की जानता और परिवार के साथ मैं भी सीबीआई जाँच की माँग करता हूँ और उम्मीद करता हूँ की हेमंत सोरेन की सरकार इसकी शीघ्र अनुशंसा करे।
इसके साथ ही पूर्व मुख्यमंत्री रघुवर दास ने राज्य सरकार से मांग की है:
1. निशा भगत के परिवार को एक करोड़ रुपये की आर्थिक सहायता दी जाए।
2. उनके परिवार के एक योग्य सदस्य को सरकारी नौकरी प्रदान की जाए।
3. आदिवासी जमीन पर अवैध कब्जे और जमीन माफियाओं के खिलाफ विशेष अभियान चलाया जाए।
4. आदिवासी महिलाओं एवं सामाजिक कार्यकर्ताओं की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए।
5. निशा भगत द्वारा उठाए गए सभी मुद्दों पर सरकार सार्वजनिक रूप से जवाब दे।
निशा भगत का बलिदान व्यर्थ नहीं जाना चाहिए। उनकी मृत्यु से जुड़े प्रत्येक सवाल का जवाब मिलना चाहिए और आदिवासी समाज को न्याय मिलना चाहिए।
मैं पूरे आदिवासी समाज से भी अपील करता हूं कि अपनी भाषा, संस्कृति, परंपरा, धार्मिक पहचान और जल-जंगल-जमीन की रक्षा के लिए एकजुट होकर लोकतांत्रिक एवं संवैधानिक तरीके से आवाज बुलंद करें।
निशा भगत को न्याय दिलाना उनके परिवार के साथ आदिवासी समाज के सम्मान, सुरक्षा और अधिकारों की लड़ाई है। निशा भगत अमर रहें।
