रांची।झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने रविवार को रांची में प्रेस वार्ता के दौरान राज्य में बांग्लादेशी घुसपैठ और उसके कारण आदिवासियों पर मंडराते संकट को लेकर हेमंत सोरेन सरकार, कांग्रेस और ईसाई मिशनरियों पर करारा हमला बोला। उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस और मिशनरियाँ आजादी के बाद से ही भोले-भाले आदिवासियों को ठगती आ रही हैं और अब परिसीमन के नाम पर उनके खिलाफ नया जाल बिछाया जा रहा है।
श्री मरांडी ने कहा कि केवल भाजपा ही संविधान में आदिवासियों और अनुसूचित जाति के अधिकारों एवं स्वाभिमान की रक्षा के लिए पूरी तरह संकल्पित है। उन्होंने इस बात पर गहरा दुख जताया कि राज्य में आदिवासियों के सामने खड़े वास्तविक संकट और घुसपैठ जैसे ज्वलंत मुद्दों पर सत्तारूढ़ दल और मिशनरियाँ पूरी तरह चुप हैं।
1951 से 2011 तक की जनगणना के आंकड़े साझा करते हुए बाबूलाल मरांडी ने बताया कि राज्य में 1951 में आदिवासियों की जनसंख्या 35.38% थी, जो 2011 में घटकर मात्र 26.20% रह गई है।1951 में मुस्लिम आबादी 8.9% थी, जो 2011 में बढ़कर 14.53% हो गई है। संथाल परगना के इलाकों में यह वृद्धि अत्यधिक तीव्र है।
सनातन धर्म मानने वालों की आबादी 87.79% से घटकर 81.17% हो गई है, जबकि ईसाई समुदाय 4.12% से बढ़कर 4.30% पर पहुंचा है।
उन्होंने आशंका जताई कि यदि स्थिति ऐसी ही रही, तो 2051 की जनगणना तक संथाल परगना और राज्य के कई क्षेत्रों में आदिवासियों की आबादी घटकर मात्र 20% रह जाएगी, जबकि मुस्लिम आबादी बढ़कर 22.73% से अधिक हो सकती है।
बाबूलाल मरांडी ने मिशनरियों की कार्यशैली पर नाराजगी जताते हुए कहा कि वे असली खतरे से आदिवासियों का ध्यान भटका रहे हैं और लोगों को अनुशासनात्मक कार्रवाई का डर दिखाकर अपनी रैलियों में भीड़ जुटाने का काम कर रहे हैं।
उन्होंने पाकुड़ का उदाहरण देते हुए कहा कि 8 नवंबर 2025 को 'आदिवासी कल्याण समिति पाकुड़' ने राज्य के मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर बांग्लादेशी घुसपैठियों द्वारा आदिवासियों की जमीन हड़पने और स्थानीय व्यापार पर कब्जा करने की गंभीर शिकायत की थी। इसके बावजूद राज्य सरकार ने इस मामले में कोई जांच या सख्त कदम नहीं उठाया, जो उसकी उदासीनता को स्पष्ट दर्शाता है।
बाबूलाल मरांडी बताएं, झारखंड में आदिवासियों की आरक्षित सीटें घटनी चाहिए या बढ़नीः आलोक कुमार दूबे

रांची। प्रदेश कांग्रेस महासचिव आलोक कुमार दूबे ने नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी के हालिया बयानों पर कड़ा पलटवार किया है। दूबे ने कहा कि झारखंड में हिंदू-मुस्लिम, बाहरी-भीतरी, गोरा-काला, आदिवासी-ईसाई और क्षेत्रीयता के नाम पर समाज को बांटने वाली राजनीति का दौर अब खत्म हो चुका है। राज्य की जनता अब भाषण नहीं, बल्कि नीयत, काम, अधिकार, शिक्षा और रोजगार की राजनीति चाहती है।
आलोक दूबे ने बाबूलाल मरांडी द्वारा आदिवासी समाज की जनसंख्या और भविष्य को लेकर फैलाए जा रहे भय के माहौल पर सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि मरांडी हाइपोथेटिकल विचार रखने के बजाय सीधा जवाब दें कि क्या वे झारखंड में आदिवासियों के लिए आरक्षित विधानसभा (वर्तमान 28) और लोकसभा (वर्तमान 5) सीटों की संख्या घटाने के पक्ष में हैं या बढ़ाने के? उन्होंने तंज कसा कि अगर मरांडी को आदिवासियों के प्रतिनिधित्व की सच में चिंता है, तो वे परिसीमन के सवाल पर चुप्पी क्यों साधे हुए हैं?
कांग्रेस महासचिव ने कहा कि भाजपा को झारखंड आंदोलन में अपनी भूमिका स्पष्ट करनी चाहिए। अलग राज्य की लड़ाई को संस्थागत राजनीतिक आधार देने में कांग्रेस की मुख्य भूमिका रही, जिसके परिणामस्वरूप 1995 में 'झारखंड क्षेत्र स्वायत्त परिषद' का गठन हुआ। स्व. ज्ञान रंजन, टी. मुचिराय मुंडा और कांग्रेस विधायकों ने अपने मंत्री पद त्यागकर अलग राज्य के निर्माण में निर्णायक भूमिका निभाई, जबकि भाजपा का इस आंदोलन में कोई ऐतिहासिक योगदान नहीं रहा।
जनसंख्या के आंकड़ों की राजनीतिक व्याख्या पर सवाल उठाते हुए दूबे ने कहा कि देश की आखिरी आधिकारिक जनगणना 2011 में हुई थी। बिना नई जनगणना के पाकुड़ जैसे जिलों की जनसांख्यिकी में बदलाव को 'घुसपैठ' या साजिश बताना सांख्यिकीय रूप से गलत है। आबादी में बदलाव के पीछे जन्म-मृत्यु दर और प्रवासन जैसे वैज्ञानिक कारण होते हैं। भाजपा 2011 के पुराने आंकड़ों को ध्रुवीकरण और भय का हथियार बनाना बंद करे।
श्री दूबे ने दावा किया कि चुनाव दर चुनाव आदिवासी समाज ने भाजपा की विभाजनकारी नीतियों को पूरी तरह नकार दिया है। आज का आदिवासी समाज जागरूक है और अपने जल, जंगल, जमीन व संवैधानिक अधिकारों की रक्षा करने वालों को पहचानता है। आदिवासियों की इसी एकजुटता से बौखलाकर भाजपा अब बाहरी-भीतरी और आदिवासी-ईसाई का राग अलाप रही है, लेकिन जनता अब नफरत की राजनीति के बहकावे में आने वाली नहीं है।
