बोकारो। बोकारो स्टील शहर के सेक्टर-12 स्थित जर्जर आवासों को लेकर पिछले एक साल से चल रहा आंदोलन अब राजनीतिक फजीहत का सबब बनता जा रहा है। एनआईटी पटना जैसी विशेषज्ञ संस्थान द्वारा 'असुरक्षित और रहने लायक नहीं' घोषित किए जा चुके इन क्वार्टरों की मरम्मत की मांग को लेकर जारी प्रदर्शन को स्थानीय स्तर पर 'मौत की दावत का आंदोलन' कहा जा रहा है। बोकारो स्टील प्लांट (बीएसएल) की नीति के खिलाफ खुद भाजपा नेताओं की अगुवाई में हो रहे इस प्रदर्शन से पार्टी की छवि पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
बोकारो स्टील प्रबंधन ने नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी, पटना से सेक्टर-12 के आवासों का तकनीकी सर्वे कराया था। रिपोर्ट में लगभग 1,242 क्वार्टरों को अत्यंत जर्जर और दुर्घटना संभावित बताते हुए तत्काल खाली कराने की सिफारिश की गई थी।
प्रबंधन की ओर से राहत देते हुए नियमसंगत आवंटियों और लाइसेंसधारियों को वैकल्पिक क्वार्टर आवंटित किए जा रहे हैं। नए आवासों की अंदरूनी व बाहरी मरम्मत और सामान शिफ्टिंग का पूरा खर्च भी बीएसएल प्रबंधन ही वहन कर रहा है। इसके बावजूद कुछ लोग जर्जर घोषित हो चुके क्वार्टरों की ही मरम्मत कराने की जिद्द पर अड़े हैं।
बुधवार को आंदोलनकारियों ने बोकारो स्टील की अधिशासी निदेशक (कार्मिक एवं प्रशासन) राजश्री बनर्जी के आवास का घेराव कर उन्हें लगभग 8 घंटे तक बंधक बनाए रखा। इस प्रदर्शन की अगुवाई भाजपा जिला मंत्री एंजेला सिंह और पूर्व मंडल अध्यक्ष मनोज सिंह कर रहे थे।
हालांकि, 1,242 प्रभावित क्वार्टरों के बावजूद मौके पर मात्र 300 के करीब लोग ही पहुंचे, जिनमें अधिकांश महिलाएं थीं। औसतन 5,000 प्रभावित लोगों की तुलना में इस मामूली उपस्थिति ने यह साफ कर दिया कि अधिकांश निवासी प्रबंधन की पुनर्वास नीति से सहमत होकर नए क्वार्टरों में शिफ्ट हो रहे हैं।
केंद्र सरकार के उपक्रम के खिलाफ स्थानीय भाजपा नेताओं के इस रुख से संगठन के भीतर अनुशासन की कमी उजागर हो रही है। बताया जा रहा है कि धनबाद सांसद ढुल्लू महतो को भी इस कार्यक्रम में शामिल होना था और उन्होंने बोकारो में इसका जिक्र भी किया था, लेकिन अंतिम समय में उन्होंने दूरी बना ली।
चर्चाओं के अनुसार सांसद को मामले की संवेदनशीलता और तकनीकी रिपोर्ट का अहसास होने के बाद उन्होंने कार्यक्रम में न जाकर पार्टी को और बड़ी फजीहत से बचा लिया। इससे पहले भी सांसद और पूर्व विधायक बिरंची नारायण जैसे वरिष्ठ नेता इस आंदोलन में शामिल हो चुके हैं, लेकिन कोई व्यावहारिक समाधान नहीं निकल सका।
बोकारो में लगातार क्वार्टरों के छज्जे, सीढ़ियां और पानी की टंकियां गिरने की घटनाएं सामने आ रही हैं। गनीमत है कि अब तक कोई बड़ी जनहानि नहीं हुई है। ऐसे में सवाल उठना लाजमी है कि यदि कल को इन जर्जर इमारतों में कोई बड़ा हादसा होता है, तो उसका जिम्मेदार कौन होगा—प्रशासनिक चेतावनी की अनदेखी करने वाले निवासी, पुनर्वास की व्यवस्था करने वाला प्रबंधन या फिर खतरे को नजरअंदाज कर आंदोलन की आड़ में सियासत करने वाले नेता?
