सुधाकर

भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने हालिया सांगठनिक फेरबदल के जरिए 2029 के चुनावों की बिसात बिछाने के स्पष्ट संकेत दे दिए हैं। झारखंड में लगातार दो विधानसभा चुनावों (2019 और 2024) में मिली करारी हार के बाद पार्टी ने अब नए सिरे से संगठन को मथने की प्रक्रिया शुरू की है। प्रदेश प्रभारी और संगठन महामंत्री—दोनों ही शीर्ष पदों पर जनजातीय समुदाय के नेताओं की तैनाती यह साफ दर्शाती है कि पार्टी राज्य में अपने खिसके हुए आदिवासी जनाधार को पुनः हासिल करने के लिए आक्रामक रणनीति अपना रही है।

नए नेतृत्व की तिकड़ी और 'छत्तीसगढ़ मॉडल' की उम्मीदः छत्तीसगढ़ में बीते 10 वर्षों से संगठन महामंत्री का दायित्व संभाल रहे पवन साय को झारखंड भेजा गया है। उनके कार्यकाल में छत्तीसगढ़ में दो विधानसभा और लोकसभा चुनाव हुए। 2023 के चुनाव में तात्कालीन प्रभारी ओम माथुर और पवन साय की जोड़ी ने पार्टी को 15 से सीधे 54 सीटों पर पहुंचाकर सत्ता में वापसी कराई थी। झारखंड में भी केंद्रीय नेतृत्व उनसे इसी प्रकार के सांगठनिक चमत्कार की उम्मीद कर रहा है।

युवा जनजातीय चेहरे की एंट्रीः मध्य प्रदेश से आने वाले गजेंद्र सिंह पटेल को नया प्रदेश प्रभारी नियुक्त किया गया है। जनजातीय पृष्ठभूमि और युवा ऊर्जा के दम पर पार्टी कार्यकर्ताओं में नया उत्साह भरने का प्रयास किया जा रहा है।

जनमुद्दों पर कमजोर पकड़ और आंदोलनों की विफलताः मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य में झारखंड भाजपा की स्थिति उस व्यक्ति की तरह दिखती है जो 'उल्टी दिशा में चलते एस्केलेटर पर ऊपर चढ़ने' (Walking up a down escalator)का निरर्थक प्रयास कर रहा हो। सत्ता पक्ष के खिलाफ पार्टी का कोई भी दांव सटीक नहीं बैठ पा रहा है।

छात्र आंदोलन का छिटकना: जेपीएससी और जेएसएससी धांधली की सीबीआई जांच तथा छात्रों पर दर्ज मुकदमों की वापसी को लेकर राज्यभर में किया गया प्रदर्शन एक महज राजनीतिक औपचारिकता बनकर रह गया। जिस छात्र वर्ग के नाम पर पार्टी सड़कों पर उतरी, उसी ने इससे दूरी बना ली। रांची के बहुचर्चित छात्र आंदोलन को भुनाने में पार्टी पूरी तरह विफल रही, क्योंकि छात्र नेताओं का मानना है कि मामला अब न्यायालय के अधीन है और उन्हें किसी राजनीतिक दल के बजाय न्यायपालिका पर अधिक भरोसा है।

बेअसर बयानबाजी: हेमंत सोरेन सरकार और प्रशासनिक तंत्र पर लगातार किए जा रहे जुबानी हमले अब निष्प्रभावी हो चुके हैं। प्रतिदिन के एक जैसे प्रेस कॉन्फ्रेंस और घिसे-पिटे आरोप न तो आम जनता को आकर्षित कर पा रहे हैं और न ही कार्यकर्ताओं में ऊर्जा भर पा रहे हैं। स्थानीय भाषा में कहें तो प्रदेश नेतृत्व की मौजूदा गतिविधियां केवल ‘गोइठा में घी सुखाने’ जैसी साबित हो रही हैं।

अंदरूनी सांगठनिक क्षरण और गुटबाजीः पार्टी के भीतर गहराता असंतोष और केंद्रीय नियंत्रण का बढ़ना संगठन के लिए सबसे बड़ी चिंता का विषय बना हुआ है।

प्रादेशिक नेतृत्व का प्रभाव कम होने से अब हर छोटा-बड़ा निर्णय दिल्ली से तय हो रहा है, जिससे जमीनी स्तर पर पकड़ और कमजोर हुई है।

संगठन कथित तौर पर महज दो शीर्ष नेताओं की आपसी होड़ और मीडिया में बने रहने की महत्वाकांक्षा तक सिमट कर रह गया है। बाकी कैडर केवल मूकदर्शक बना हुआ है।

निष्ठावान कार्यकर्ताओं में उपेक्षा का भाव: पार्टी के भीतर चाटुकारिता और धनबल को प्राथमिकता मिलने से वर्षों से समर्पित कार्यकर्ता खुद को ठगा और उपेक्षित महसूस कर रहे हैं। वरिष्ठ नेताओं के बीच एक-दूसरे को नीचा दिखाने की होड़ मची है।

यदि नए नेतृत्व ने संगठन में पनपी गुटबाजी, आंतरिक कलह और घटते जनाधार पर समय रहते कठोर कदम नहीं उठाए, तो 2029 का चुनाव पार्टी के लिए एक और बड़ा झटका साबित हो सकता है। भाजपा को केवल कागजी प्रदर्शनों और प्रेस कॉन्फ्रेंस की राजनीति से बाहर निकलकर जमीनी स्तर पर ठोस बदलाव करने होंगे; वरना राज्य के राजनीतिक पटल पर पार्टी का हाशिए पर जाना तय है।