सुधाकर
झारखंड की राजधानी रांची का ऐतिहासिक मोरहाबादी मैदान बीते 30 अगस्त को एक बार फिर बड़ी राजनीतिक हलचल का गवाह बना। परिसीमन (Delimitation) के विरोध और आदिवासियों की एकजुटता का संदेश देने के लिए आयोजित ‘आदिवासी एकता महाजुटान रैली’ ने अपने विशाल जनसैलाब से राजनीतिक हलकों में खलबली मचा दी। हालांकि, भीड़ की दृष्टि से बेहद सफल दिखने वाली इस रैली ने अब झारखंड की राजनीति के कई छिपे हुए समीकरणों और मतभेदों को सतह पर ला दिया है।
इस रैली की पूरी कमान कांग्रेस के वरिष्ठ आदिवासी नेता बंधु तिर्की के हाथों में थी। पिछले कुछ महीनों से राज्यभर का दौरा कर उन्होंने इस विशाल भीड़ को मोरहाबादी मैदान में एकत्र किया। नेताओं के लिए विशाल भीड़ हमेशा से राजनीतिक साख और शक्ति का प्रतीक रही है, और यह रैली भी बंधु तिर्की का अपनी ताकत दिखाने का एक अहसास थी।
रैली में उमड़ी भीड़ का प्रभाव इतना व्यापक था कि विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) में खलबली मच गई। रैली के दिन ही देर रात तक भाजपा के आदिवासी नेता इस आयोजन के विरोध और आलोचना में बयानबाजी करते रहे। हालांकि, जल्दबाजी में की गई इस बयानबाजी में भाजपा से एक बड़ी चूक भी हो गई।
भाजपा नेताओं ने दावा किया कि राज्य सरकार की मुख्य घटक दल झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) ने इस रैली से पूरी तरह दूरी बना ली है। जबकि जमीनी हकीकत यह थी कि मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को इस कार्यक्रम का सीधा निमंत्रण मिला था। स्वयं उपस्थित न होकर उन्होंने तमाड़ विधायक विकास मुंडा को अपने आधिकारिक प्रतिनिधि के रूप में इस महाजुटान में भेजा था।
रैली की सफलता के बाद 1 सितंबर को बंधु तिर्की ने प्रमुख समाचार पत्रों में एक धन्यवाद विज्ञापन जारी किया। लेकिन यही विज्ञापन इस पूरे घटनाक्रम में एक नया मोड़ ले आया। विज्ञापन में जिन प्रमुख चेहरों की तस्वीरें छपीं, उनमें अधिकांश लोग कैथोलिक मिशन और चर्च से जुड़े हुए थे—जिनमें से एक प्रमुख नाम सामाजिक कार्यकर्ता ग्लैडसन डुंगडुंग का भी था।
ग्लैडसन डुंगडुंग ने अपने सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए कांग्रेस और बंधु तिर्की पर आदिवासियों के साथ 'छल' करने का गंभीर आरोप लगाया। उन्होंने 31 अगस्त और 1 सितंबर के समाचार पत्रों की तस्वीरों की तुलना करते हुए लिखा:
30 अगस्त को रांची के मोरहाबादी मैदान में आयोजित ऐतिहासिक 'आदिवासी एकता महाजुटान रैली' के लिए दिन-रात मेहनत करने वाले हम लोगों की तस्वीर 1 सितंबर को छपी, जबकि नालायक कांग्रेसी नेताओं की तस्वीर और वक्तव्य 31 अगस्त को ही अखबारों में छाए रहे। विगत 75 वर्षों से कांग्रेसी नेता हम आदिवासियों को ऐसे ही धोखा देते आ रहे हैं।
उन्होंने आगे बेहद सख्त लहजे में कहा कि कांग्रेसी नेताओं ने आदिवासियों के इस गैर-राजनीतिक मंच पर कब्जा जमाया और सामाजिक कार्यकर्ताओं के भाषण का समय छीन लिया। यदि कांग्रेस को यही करना था तो उन्हें यह आयोजन "आदिवासी कांग्रेस" के बैनर तले करना चाहिए था। इस तीखे हमले के बाद अब मुख्य आयोजक बंधु तिर्की खुद अपनी ही बिरादरी और सहयोगियों के कटघरे में खड़े नजर आ रहे हैं।
इस महाजुटान का एक बेहद संवेदनशील पहलू इसका धार्मिक और सामाजिक स्वरूप था। रैली में आने वाली भीड़ का एक बड़ा हिस्सा ईसाई समुदाय से था। रांची कैथोलिक आर्चडायोसिस के महाधर्माध्यक्ष विन्सेंट आइंद ने बाकायदा पत्र जारी कर ईसाई समुदाय से इस महाजुटान में शामिल होने का आह्वान किया था।
झारखंड की राजनीति में चर्च की इस प्रकार प्रत्यक्ष और सार्वजनिक राजनीतिक भूमिका पहले अमूमन देखने को नहीं मिलती थी। लेकिन इस रैली के संदर्भ में दो प्रमुख बातें खुलकर सामने आईं। इस रैली को मुख्य रूप से केवल कैथोलिक मिशन का ही समर्थन प्राप्त था, जबकि झारखंड में अलग-अलग चर्चों और धाराओं से जुड़े ईसाइयों की एक बड़ी आबादी निवास करती है।
आदिवासी समाज का एक बड़ा और प्रभावशाली हिस्सा—'सरना धर्म' के मानने वाले—इस रैली का खुलकर विरोध कर रहे थे। इससे आदिवासियों के दो प्रमुख घटकों (सरना बनाम ईसाई) के बीच का सामाजिक अंतर और गहरा होता दिखा।
झारखंड के मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन आदिवासियों के सबसे सर्वमान्य नेता के रूप में स्थापित हैं। उनकी राजनीतिक ताकत का मुख्य आधार यह है कि उन्हें 'सरना' और 'ईसाई' दोनों ही वर्गों का मजबूत समर्थन हासिल है। ऐसे में सवाल उठता है कि इतनी विशाल भीड़ और राजनीतिक मंच उपलब्ध होने के बावजूद हेमंत सोरेन खुद मोरहाबादी मैदान क्यों नहीं पहुंचे?
राजनीतिक विशेषज्ञों के अनुसार, हेमंत सोरेन का न जाना एक सोच-समझकर उठाया गया कदम (Calculated Risk) था। यदि हेमंत सोरेन कैथोलिक मिशन के प्रत्यक्ष समर्थन वाली रैली के मंच पर खड़े होते, तो इससे सरना समाज में नकारात्मक संदेश जाता। सरना समाज इस रैली का विरोध कर रहा था, और सोरेन किसी भी कीमत पर अपने मुख्य वोट बैंक (सरना आदिवासियों) को नाराज नहीं करना चाहते थे।
यह आयोजन बंधु तिर्की के व्यक्तिगत शक्ति प्रदर्शन और कांग्रेस के प्रभाव को बढ़ाने का प्रयास था। सोरेन ने अपने प्रतिनिधि को भेजकर गठबंधन धर्म तो निभाया, लेकिन खुद मंच पर न जाकर कांग्रेस को आदिवासियों का एकमात्र रहनुमा बनने का मौका नहीं दिया।
मोरहाबादी का यह 'आदिवासी एकता महाजुटान' भले ही परिसीमन के विरोध में आदिवासियों की ताकत दिखाने के लिए बुलाया गया था, लेकिन इसने झारखंड की आदिवासी राजनीति के जटिल अंतर्विरोधों को उजागर कर दिया है।
जहां एक ओर कांग्रेस और बंधु तिर्की पर आदिवासी मंच का 'राजनीतिक अपहरण' करने का आरोप लग रहा है, वहीं दूसरी ओर चर्च की प्रत्यक्ष भागीदारी ने सरना-ईसाई समीकरणों को और संवेदनशील बना दिया है। इस पूरे घटनाक्रम में हेमंत सोरेन ने अपनी अनुपस्थिति से यह साबित कर दिया है कि वे केवल भीड़ के आकर्षण में बहने वाले नेता नहीं हैं, बल्कि सामाजिक संतुलन और दूरगामी राजनीतिक गणित को बखूबी समझते हैं।
