देवघर। पूरे देश में विजयादशमी यानी दशहरा पर असत्य पर सत्य की जीत के प्रतीक के रूप में रावण दहन की परंपरा है, लेकिन झारखंड के देवघर (वैद्यनाथधाम) में इससे बिल्कुल अलग परंपरा है। यहाँ रावण का पुतला नहीं जलाया जाता, बल्कि उन्हें राजा मानकर पूजा जाता है। ऐसी मान्यता है कि रावण आज भी यहाँ की संस्कृति में रचे-बसे हैं और उन्हीं के कारण देवघर में बाबा वैद्यनाथ का धाम स्थापित हुआ है।
बाबा वैद्यनाथ से पहले रावण की स्तुति
देवघर में बाबा वैद्यनाथ की पूजा-अर्चना से पहले महापंडित रावण का स्मरण किया जाता है। सावन और अन्य महीनों में गंगा जल लेकर वैद्यनाथधाम पहुँचने वाले लाखों शिवभक्त जब काँवर का संकल्प कराते हैं, तो सबसे पहले "श्रीश्री 108 रावणेश्वर बाबा वैद्यनाथ" कहते हैं। पंडा धर्मरक्षिणी सभा के पूर्व महामंत्री पंडित दुर्लभ मिश्र के अनुसार, यहाँ रावण के सकारात्मक रूप यानी प्रकांड विद्वान और शिव भक्त स्वरूप की पूजा की जाती है।
सरदार पंडा ने लिखा था रावण पर झूमर
वैद्यनाथ मंदिर के तत्कालीन सरदार पंडा भवप्रीता नंद ओझा ने रावण का गुणगान करते हुए देवघरिया भाषा (खोरठा) में एक झूमर भी लिखा था, जिसमें उल्लेख है:
"धन्य-धन्य हे रावण राजा... करै छी तोरो पूजा... पारसमणि आनी देल्हन हाथ- बाबा भोलानाथ... देघरै विराजे गौरा साथ..."
(अर्थात— हे रावण राजा, हम आपकी पूजा करते हैं, क्योंकि आपने ही पारसमणि के रूप में बाबा वैद्यनाथ को देवघर लाकर हमें सौंपा है।)
ऐसे हुई थी बाबा वैद्यनाथ धाम की स्थापना
पौराणिक कथा के अनुसार, राक्षसराज रावण ने हिमालय पर घोर तपस्या कर शिवजी को प्रसन्न किया था और शिवलिंग को लंका ले जाने की अनुमति प्राप्त की थी। भगवान शिव ने शर्त दी थी कि मार्ग में यदि इसे कहीं भी जमीन पर रखा गया, तो वह वहीं स्थापित हो जाएगा।
यात्रा के दौरान लघुशंका (शौचालय) की आवश्यकता होने पर रावण ने वह शिवलिंग एक चरवाहे (भगवान विष्णु का रूप) को थमा दिया। अत्यधिक भारी होने के कारण चरवाहे ने उसे भूमि पर रख दिया। इसके बाद रावण लाख कोशिशों के बाद भी उसे उठा नहीं पाया और निराश होकर लौट गया। बाद में देवी-देवताओं ने उसी स्थान पर शिवलिंग की प्रतिष्ठापना की, जो आज का पावन 'वैद्यनाथधाम' कहलाता है।
