रांची/बोकारो। बोकारो स्टील प्लांट (बीएसएल) के सभी गेटों को बंद कर उत्पादन पूरी तरह ठप किए जाने के मामले में झारखंड हाईकोर्ट ने कड़ी नाराजगी जताई है। मामले की गंभीरता को देखते हुए रविवार को विशेष सुनवाई करते हुए जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद की अदालत ने बोकारो के उपायुक्त को तुरंत सभी गेट खुलवाने और कर्मचारियों की प्लांट में आवाजाही व काम पर जाना सुनिश्चित करने के कड़े निर्देश दिए हैं। मामले की अगली सुनवाई अब 28 अक्टूबर को होगी।

हाईकोर्ट के निर्देश के बाद जिला प्रशासन ने त्वरित कार्रवाई करते हुए रविवार को बोकारो इस्पात संयंत्र के मुख्य द्वार के 200 मीटर के दायरे में धारा 144 लागू कर दी। पुलिस-प्रशासन ने प्रदर्शनकारियों को हटाकर गेट खुलवाए और स्थिति को सामान्य किया। यह निषेधाज्ञा आदेश 18 अक्टूबर की सुबह पांच बजे से अगले आदेश तक प्रभावी रहेगा।

रविवार को हुई विशेष सुनवाई के दौरान बोकारो के उपायुक्त अदालत में ऑनलाइन उपस्थित हुए, जिनसे कोर्ट ने जवाब तलब किया। सेल की ओर से अधिवक्ता इंद्रजीत सिन्हा ने अदालत में अपना पक्ष रखा।

प्लांट के मुख्य गेट और अन्य प्रवेश द्वारों पर आंदोलनकारियों के डटे रहने के कारण लगभग 3,000 कर्मचारी प्लांट के अंदर ही फंस गए थे। गेट जाम होने के कारण प्लांट के अंदर और बाहर की सभी गतिविधियां, उत्पादन और ढुलाई पूरी तरह ठप हो गई थीं। हालांकि, प्रशासन द्वारा गेट खाली कराए जाने के बाद सभी फंसे हुए कर्मचारी बाहर निकल आए हैं।

नियोजन की मांग को लेकर पिछले आठ दिनों से भूख हड़ताल पर बैठे विस्थापित अप्रेंटिस संघ ने शनिवार को बीएसएल के मुख्य द्वार समेत सभी महत्वपूर्ण गेटों को जाम कर दिया था। आंदोलनकारियों के कड़े पहरे के कारण किसी भी स्थायी या ठेका कर्मचारी को प्लांट के अंदर जाने की अनुमति नहीं मिल रही थी। प्रशासनिक भवन से मेन गेट जाने वाली सड़क पर सैकड़ों की संख्या में कर्मचारी और अधिकारी फंसे नजर आए। इस बीच, कुछ स्थानीय नेताओं ने ड्यूटी पर जा रहे मजदूरों से एक दिन की ड्यूटी पर न जाने की अपील की, ताकि विस्थापितों को उनका हक मिल सके।

आंदोलन का नेतृत्व कर रहे विस्थापित नेता वकील अग्रवाल, सुनील महतो, चौहान महतो और चंद्रकांत महतो ने बीएसएल प्रबंधन और जिला प्रशासन पर गंभीर वादाखिलाफी का आरोप लगाया है। उन्होंने कहा कि हर बार आंदोलन तेज होने पर केवल त्रिपक्षीय वार्ता का नाटक किया जाता है, लेकिन धरातल पर कोई ठोस नतीजा नहीं निकलता।

विस्थापितों ने आरोप लगाया कि उनके पूर्वजों ने अपनी जमीन देकर प्लांट का निर्माण कराया, लेकिन आज वे दाने-दाने को मोहताज हैं और चतुर्थ वर्गीय पदों पर मिलने वाला आरक्षण भी साजिश के तहत खत्म कर दिया गया है। फिलहाल स्थिति को नियंत्रित करने के लिए जिला प्रशासन और प्लांट प्रबंधन के बीच उच्चस्तरीय बैठक जारी है।