सुधाकर

​झारखंड भाजपा में एक नए अध्याय का आगाज़ हुआ है। 2029 के राजनीतिक लक्ष्य को साधने के लिए नए प्रदेश प्रभारी गजेंद्र सिंह पटेल तथा सह-प्रभारी सौरभ सिंह एवं निवेदिता सिंह ने कमान संभाल ली है। कार्यकर्ताओं में नई ऊर्जा फूंकने का यह संकल्प किसी सामान्य स्थान से नहीं, बल्कि भगवान बिरसा मुंडा की पवित्र जन्मभूमि उलिहातु से लिया गया है। रांची पहुंचते ही नए नेतृत्व ने सीधे उलिहातु जाकर भगवान बिरसा मुंडा को नमन किया, जो यह साफ संकेत देता है कि पार्टी का मुख्य केंद्र बिंदु आदिवासी अस्मिता और उनका विश्वास बहाल करना है।

​भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व ने झारखंड के सामाजिक और राजनीतिक समीकरणों को देखते हुए रणनीतिक बदलाव किए हैं। संगठन महामंत्री पवन साय (छत्तीसगढ़) और प्रदेश प्रभारी गजेंद्र सिंह पटेल (मध्य प्रदेश)—दोनों ही आदिवासी समुदाय से आते हैं। हालांकि, इस नए नेतृत्व के सामने राह आसान नहीं है। इन्हें बाहरी राजनीतिक समीकरणों से लेकर आंतरिक सांगठनिक चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा।

​ पिछले लोकसभा और विधानसभा चुनावों में अनुसूचित जनजाति (एसटी) के लिए आरक्षित सीटों पर भाजपा को भारी नुकसान झेलना पड़ा था। पार्टी की सबसे बड़ी चुनौती इस आदिवासी वोट बैंक को वापस अपने पाले में लाना है।

​राज्य के ओबीसी बहुल इलाकों में कुड़मी (कुर्मी) समाज एक निर्णायक वोट बैंक है, जिनकी प्रमुख मांग खुद को एसटी सूची में शामिल कराने की है। हाल ही में पुरुलिया में आयोजित 'करम परब' के मंच से कुड़मी समाज ने अपनी राजनीतिक ताकत का प्रदर्शन किया, जहां पश्चिम बंगाल के नेता प्रतिपक्ष शुभेंदु अधिकारी भी शामिल हुए थे।

​ यदि केंद्र सरकार कुड़मी समाज की मांग पर सहमति जताती है, तो झारखंड का मूल आदिवासी समुदाय इसके कड़े विरोध में खड़ा हो जाएगा, जिसका सीधा सियासी फायदा झामुमो और कांग्रेस उठाने की कोशिश करेंगे। दिलचस्प बात यह है कि झामुमो में कुड़मी समाज के कई बड़े नेता होने के बावजूद उन्होंने कभी खुलकर इसे मुद्दा नहीं बनाया। ऐसे में इस संवेदनशील मुद्दे पर संतुलन बनाए रखना भाजपा के लिए सबसे कठिन परीक्षा होगी।

​प्रदेश भाजपा की सबसे बड़ी अंदरूनी चुनौती अपने ही शीर्ष नेताओं को एक मंच पर लाना और एकजुट रखना है। पार्टी के पास वर्तमान में पांच पूर्व मुख्यमंत्री हैं—बाबूलाल मरांडी, अर्जुन मुंडा, मधु कोड़ा और चंपई सोरेन (जो आदिवासी समाज के विभिन्न घटकों संथाल, मुंडा, हो आदि का प्रतिनिधित्व करते हैं)।

​राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार इन सभी कद्दावर नेताओं को एक लय में लाना "मेढक को तराजू में तौलने" जैसा जटिल काम है। अंदरूनी गुटबाज़ी और नेताओं के बीच तालमेल की कमी (जहाँ 'जितनी डफली, उतना राग' वाली स्थिति है) पार्टी के लिए सबसे बड़ा सेटबैक साबित होती रही है।

​संगठन के स्तर पर भी नए नेतृत्व को बड़ी सर्जरी की जरूरत है।निचले स्तर पर यह शिकायत आम है कि संगठन में कई ऐसे पदधारकों को जगह मिली है, जिनका न तो कोई जनाधार है और न ही जमीनी समझ। 'गणेश परिक्रमा' (चाटुकारिता) करने वालों को तरजीह मिलने के कारण मेहनत करने वाले मूल और निष्ठावान कार्यकर्ता उपेक्षित महसूस कर रहे हैं।जब वास्तविक कार्यकर्ता संगठन से दूरी बना लेता है, तो ऐन चुनाव के वक्त पार्टी को इसका बड़ा खामियाजा भुगतना पड़ता है।

​उलिहातु से शुरू हुआ यह सफर भाजपा के लिए सिर्फ एक औपचारिक शुरुआत नहीं, बल्कि आत्ममंथन का अवसर है। नए प्रभारी गजेंद्र सिंह पटेल और उनकी टीम के सामने 2029 के लक्ष्य को पाने के लिए कुड़मी-आदिवासी समीकरण के भंवर से निकलना, गुटबाज़ी को खत्म कर शीर्ष नेताओं में तालमेल बनाना और जमीनी कार्यकर्ताओं का मनोबल लौटाना—ये तीन मुख्य प्राथमिकताएं होंगी।