सुधाकर

राजनीति में फैसले दूरदर्शिता से लिए जाते हैं या जमीनी हकीकत से आंखें मूंदकर, झारखंड भाजपा के हालिया सांगठनिक फेरबदल को देखकर यह तय करना मुश्किल नहीं रह गया है। 2024 के लोकसभा और विधानसभा चुनावों में आदिवासियों द्वारा पूरी तरह नकार दिए जाने के बाद उम्मीद थी कि भाजपा अपनी गलतियों से सबक लेगी। लेकिन पार्टी आलाकमान के नए फैसलों ने राजनीतिक विश्लेषकों को हैरान कर दिया है। इसे नीति कहें या 'विपरीत बुद्धि'—भाजपा ने झारखंड के लगभग 1.06 करोड़ आदिवासी मतदाताओं को साधने की कमान उन दो नेताओं को सौंपी है, जिनकी जातियों की कुल आबादी पूरे राज्य में महज 8,745 के करीब है!

झारखंड की राजनीति में आदिवासियों की भूमिका केवल निर्णायक नहीं, बल्कि सत्ता की चाबी है। राज्य में अनुसूचित जनजाति (एसटी) के लिए लोकसभा की 5 और विधानसभा की 28 सीटें आरक्षित हैं। आंकड़ों का ग्राफ देखें तो भाजपा का जनाधार ढलान पर है।2014 में भाजपा ने 28 में से 11-12 एसटी सीटें जीतकर अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया था।2019 में यह आंकड़ा गिरकर मात्र 2 सीटों पर आ गया।

2024 विधानसभा में भाजपा का प्रदर्शन अपने सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया और पार्टी महज 1 सीट पर सिमट गई।2024 लोकसभा चुनाव में राज्य की सभी 5 आदिवासी आरक्षित सीटों पर भाजपा का सूपड़ा साफ हो गया।

चुनाव दर चुनाव आदिवासियों का घटता भरोसा यह बताने के लिए काफी था कि भाजपा का पारंपरिक आदिवासी जनाधार खिसक चुका है।

2024 की ऐतिहासिक हार के बाद केंद्रीय नेतृत्व ने छत्तीसगढ़ से पवन साय को संगठन महामंत्री और मध्य प्रदेश (खरगोन-बड़वानी) के सांसद गजेंद्र सिंह पटेल को राज्य प्रभारी नियुक्त किया है। दोनों नेता निसंदेह कद्दावर हैं, लेकिन झारखंड के जनसांख्यिकी (डेमोग्राफिक्स) के लिहाज से यह फैसला किसी पहेली से कम नहीं है।

पवन साय कंवर जनजाति से आते हैं। झारखंड में कंवर समुदाय को 8 जून 2003 को 31वीं अनुसूचित जनजाति के रूप में मान्यता मिली थी। 2011 की जनगणना के अनुसार राज्य में इनकी कुल आबादी मात्र 8,145 है, जो मुख्य रूप से गुमला के डुमरी-चैनपुर, सिमडेगा के कुरडेग और पलामू के कुछ हिस्सों तक ही सीमित है।

गजेंद्र सिंह पटेल भील (भीलाला) समुदाय से हैं। भील मुख्य रूप से पश्चिमी और मध्य भारत (मध्य प्रदेश, गुजरात, राजस्थान) की जनजाति है। झारखंड सरकार की अधिसूचित एसटी सूची में भील जनजाति का नाम तक दर्ज नहीं है। शोध और आंकड़ों (जैसे जॉशुआ प्रोजेक्ट) के अनुसार, रोजगार के सिलसिले में रांची, धनबाद, बोकारो और जमशेदपुर में रहने वाले भील परिवारों की अनुमानित संख्या मात्र 600 के आसपास है।

जिस राज्य में संथाल, उरांव, मुंडा और हो जनजातियों की विशाल आबादी चुनाव के नतीजे तय करती है, वहां केवल 8,745 की संयुक्त आबादी वाले सामाजिक पृष्ठभूमि के बाहरी नेताओं को कमान सौंपना भाजपा के 'मास्टरस्ट्रोक' पर सवालिया निशान लगाता है।

2024 के झटके के बाद योजना यह बनी थी कि झारखंड के स्थानीय दिग्गज नेताओं को उनकी जातिगत पकड़ के अनुसार मैदान में उतारा जाएगा। जिसमें यह तय हुआ था कि संथाल बहुल क्षेत्र बाबूलाल मरांडी और चंपई सोरेन,मुंडा बहुल क्षेत्र अर्जुन मुंडा और अन्य,उरांव बहुल क्षेत्र समीर उरांव और सुदर्शन भगत एवं हो बहुल क्षेत्र: मधु कोड़ा संभालेंगे।

लेकिन, यह महत्वाकांक्षी रणनीति प्रदेश नेताओं की आपसी खींचतान और अंदरूनी गुटबाजी की बलि चढ़ गई। प्रदेश स्तर पर एकजुटता न बन पाने के कारण आलाकमान ने बाहरी नेताओं को थोपने का रास्ता चुना।

छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश के नेताओं की इस हाई-प्रोफाइल नियुक्ति ने दो कड़वे सवाल खड़े कर दिए हैं।

क्या भाजपा आलाकमान को यह यकीन हो चुका है कि उसके स्थानीय आदिवासी चेहरों ने अपना राजनीतिक प्रभाव पूरी तरह खो दिया है?

क्या झारखंड के जटिल और विविधता भरे जनजातीय समाज (जिसकी अपनी भाषाएं, त्यौहार और सांस्कृतिक विशेषताएं हैं) को बाहरी नेता समझ पाएंगे?

आदिवासी बहुल निर्वाचन क्षेत्रों के 1.06 करोड़ मतदाताओं को रिझाने के लिए केवल सांगठनिक सख्ती काफी नहीं होती, उसके लिए सांस्कृतिक जुड़ाव और स्थानीय विश्वसनीयता की जरूरत होती है।

झारखंड भाजपा ने ओबीसी मतदाताओं को साधने के लिए पहले ही आदित्य साहू को प्रदेश अध्यक्ष बनाया हुआ है। लेकिन, ट्राइबल वोट बैंक को वापस पाने के लिए उसने जो नया दांव खेला है, वह कागजों पर भले ही अनुशासित लगे, लेकिन धरातल पर अंकगणित के बिल्कुल खिलाफ दिखता है।

क्या यह फैसला 2029 के लोकसभा और विधानसभा चुनावों में भाजपा की किस्मत बदलेगा, या फिर स्थानीय सांस्कृतिक समझ के अभाव में यह 'विपरीत बुद्धि' का एक और उदाहरण बनकर रह जाएगा? इसका जवाब भविष्य के गर्त में छिपा है,लेकिन फिलहाल पार्टी कार्यकर्ताओं के भीतर संशय और असंतोष की सुगबुगाहट साफ महसूस की जा सकती है।