सुदेश कुमार
झारखंड की लोक-संस्कृति और आदिवासी परंपराओं में करम पर्व का विशेष स्थान है। प्रकृति के प्रति आस्था, भाई-बहन के स्नेह, कृषि समृद्धि और सामुदायिक एकता का संदेश देने वाला यह पर्व हर वर्ष उत्साह और उल्लास के साथ मनाया जाता है। करम पर्व में प्रकृति पूजा के साथ लोकगीत, नृत्य और पारंपरिक रीति-रिवाजों की जीवंत झलक देखने को मिलती है। करम पर्व की सबसे खास पहचान करम डाल है। पर्व के अवसर पर युवक-युवतियां और महिलाएं करम वृक्ष की डाल लाकर उसे विधि-विधान के साथ स्थापित करते हैं। इसके बाद करम देवता की पूजा-अर्चना की जाती है। मान्यता है कि करम देवता सुख, समृद्धि, अच्छी फसल और परिवार की खुशहाली प्रदान करते हैं। कई समुदायों में बहनें अपने भाइयों की सुख-समृद्धि और लंबी आयु की कामना करते हुए व्रत भी रखती हैं। पर्व से पहले गांवों और बस्तियों में तैयारियां शुरू हो जाती हैं। घर-आंगन की साफ-सफाई, पारंपरिक पकवानों की तैयारी और पूजा की सामग्री जुटाने के साथ ही युवाओं की टोली करम गीतों और नृत्य की तैयारी करती है। करम पर्व की रात मांदर, नगाड़े और पारंपरिक वाद्य यंत्रों की थाप पर लोग सामूहिक नृत्य करते हैं। गीतों में प्रकृति, खेती, प्रेम, रिश्तों और सामाजिक जीवन की भावनाएं अभिव्यक्त होती हैं।
करम पर्व केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि प्रकृति और मनुष्य के रिश्ते का उत्सव भी है। करम वृक्ष की पूजा के माध्यम से प्रकृति के संरक्षण और उसके प्रति सम्मान का संदेश दिया जाता है। कृषि आधारित समाज में यह पर्व अच्छी बारिश, बेहतर फसल और समृद्धि की कामना से भी जुड़ा हुआ है। शहरी क्षेत्रों में भी करम पर्व की रौनक लगातार बढ़ रही है। विभिन्न सामाजिक और सांस्कृतिक संस्थाओं की ओर से करम महोत्सव आयोजित किए जाते हैं, जहां पारंपरिक वेशभूषा में लोग शामिल होते हैं। सांस्कृतिक कार्यक्रमों में करम गीत और नृत्य नई पीढ़ी को अपनी जड़ों और परंपराओं से जोड़ने का काम करते हैं। आधुनिकता के दौर में जहां जीवनशैली तेजी से बदल रही है, वहीं करम पर्व झारखंड की सांस्कृतिक पहचान को जीवंत बनाए रखने का माध्यम बना हुआ है। यह पर्व आने वाली पीढ़ियों को यह संदेश देता है कि प्रकृति का सम्मान, रिश्तों की मजबूती और सामुदायिक एकता ही समृद्ध समाज की आधारशिला है।
करम पर्व क्यों मनाया जाता है, क्या है इसकी कहानीः भाई-बहन के प्रेम, प्रकृति पूजा और सुख-समृद्धि की कामना से जुड़ा है करम पर्व। मांदर की थाप, करम गीतों की गूंज, पारंपरिक वेशभूषा और करम डाली के आसपास थिरकते कदम... झारखंड में करम पर्व आते ही गांव से लेकर शहर तक प्रकृति और लोक संस्कृति का रंग दिखाई देने लगता है। यह पर्व सिर्फ पूजा-पाठ का अवसर नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति सम्मान, भाई-बहन के प्रेम, कृषि जीवन और सामुदायिक एकता का उत्सव है।भाद्रपद महीने में मनाया जाने वाला करम पर्व झारखंड की प्रमुख लोक एवं आदिवासी परंपराओं में शामिल है। अलग-अलग समुदायों में इसके रीति-रिवाजों में कुछ अंतर जरूर दिखाई देता है, लेकिन करम देवता की पूजा और करम वृक्ष की डाल का विशेष महत्व लगभग हर जगह देखने को मिलता है।
करम डाली में आस्थाः करम पर्व की सबसे महत्वपूर्ण परंपरा करम वृक्ष की डाली को पूजा स्थल पर स्थापित करना है। इसे प्रकृति और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। पूजा के दौरान करम देवता से परिवार की खुशहाली, अच्छी फसल और सुख-समृद्धि की कामना की जाती है। कई स्थानों पर पर्व से पहले युवतियां और महिलाएं विशेष तैयारी करती हैं। पूजा के लिए अनाज, फल और पारंपरिक सामग्री जुटाई जाती है। करम डाली को स्थापित करने के बाद गीत-संगीत और नृत्य का दौर शुरू होता है, जो देर रात तक चलता है।
क्या है करम पर्व की लोककथाः करम पर्व से जुड़ी कई लोककथाएं अलग-अलग क्षेत्रों और समुदायों में प्रचलित हैं। इनमें सबसे प्रसिद्ध कथाओं में सात भाइयों और उनकी बहन की कहानी सुनाई जाती है। लोककथा के अनुसार, सात भाई अपनी बहन से बहुत प्रेम करते थे। एक बार वे किसी महत्वपूर्ण कार्य में इतने व्यस्त हो गए कि करम पूजा और अपनी बहन की भावनाओं पर ध्यान नहीं दे पाए। बहन करम पर्व के अवसर पर करम देवता की पूजा करना चाहती थी, लेकिन भाइयों ने उसकी बात को महत्व नहीं दिया। कहा जाता है कि इससे करम देवता नाराज हो गए और परिवार पर संकट आने लगा। घर की समृद्धि समाप्त होने लगी और भाइयों को कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। बाद में उन्हें अपनी भूल का एहसास हुआ। उन्होंने करम देवता की पूजा की और अपनी गलती के लिए क्षमा मांगी। इसके बाद परिवार में फिर से सुख-समृद्धि लौट आई। इसी लोकविश्वास के आधार पर करम पर्व को भाई-बहन के रिश्ते, परिवार की खुशहाली और कर्म के महत्व से जोड़कर देखा जाता है। हालांकि, इस कथा के अलग-अलग स्थानीय रूप भी मिलते हैं।
सिर्फ पूजा नहीं, प्रकृति से रिश्ताः करम पर्व की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें प्रकृति को केंद्र में रखा गया है। करम वृक्ष की पूजा इस बात का प्रतीक है कि मानव जीवन प्रकृति से अलग नहीं है। झारखंड का पारंपरिक जीवन जंगल, जमीन, जल और कृषि से गहराई से जुड़ा रहा है। ऐसे में करम पर्व केवल धार्मिक आस्था को अभिव्यक्त नहीं करता, बल्कि प्रकृति के संरक्षण और उसके प्रति कृतज्ञता की भावना को भी मजबूत करता है।
गीत और नृत्य हैं पर्व की जानः करम पर्व की पहचान इसके लोकगीत और सामूहिक नृत्य से भी है। मांदर और नगाड़े की थाप पर युवक-युवतियां पारंपरिक गीत गाते हुए सामूहिक नृत्य करते हैं। करम गीतों में प्रेम, प्रकृति, कृषि, परिवार और सामाजिक जीवन की झलक मिलती है। गीतों और नृत्य के माध्यम से एक पीढ़ी अपनी संस्कृति दूसरी पीढ़ी तक पहुंचाती है। यही वजह है कि करम पर्व आज भी युवाओं के बीच उतना ही लोकप्रिय है।
बदलते समय में भी कायम है परंपराः शहरों के विस्तार और बदलती जीवनशैली के बावजूद करम पर्व की सांस्कृतिक चमक कम नहीं हुई है। रांची समेत झारखंड के विभिन्न हिस्सों में सामुदायिक स्तर पर करम पूजा और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। युवा पीढ़ी भी पारंपरिक वेशभूषा पहनकर करम गीत और नृत्य में हिस्सा लेती है। सोशल मीडिया और आधुनिक मंचों ने करम की लोक संस्कृति को व्यापक पहचान देने में भी भूमिका निभाई है। करम पर्व इसलिए खास है क्योंकि यह अतीत की परंपराओं को वर्तमान की पीढ़ी से जोड़ता है। करम डाली के नीचे होने वाली पूजा से लेकर मांदर की थाप पर होने वाला सामूहिक नृत्य तक, हर रंग झारखंड की मिट्टी, प्रकृति और लोकजीवन की कहानी कहता है।
करम पर्व का संदेश भी उतना ही सरल और गहरा है—प्रकृति का सम्मान करें, रिश्तों को मजबूत बनाएं और समाज में मिल-जुलकर खुशियां बांटें।
