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Saturday, June 19, 2021

RSS और उसकी विचारधारा

RSS और उसकी विचारधारा
—मधु लिमये
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मैंने राजनीति में 1937 में प्रवेश किया। उस समय मेरी उम्र बहुत कम थी, लेकिन चूंकि मैंने मैट्रिक की परीक्षा जल्दी पास कर ली थी, इसलिए कॉलेज में भी मैंने बहुत जल्दी प्रवेश किया। उस समय पूना में RSS और सावरकरवादी लोग एक तरफ और राष्ट्रवादी और विभिन्न समाजवादी और वामपंथी दल दूसरी तरफ थे।

मुझे याद है कि 1 मई, 1937 को हम लोगों ने मई दिवस का जुलूस निकाला था। उस जुलूस पर RSS के स्वयंसेवकों और सावरकरवादी लोगों ने हमला किया था और उसमें प्रसिद्ध क्रान्तिकारी सेनापति बापट और हमारे नेता एस एम जोशी को भी चोटें आयी थीं। तो उसी समय से इन लोगों के साथ हमारा मतभेद था।

● हमारा संघ से पहला मतभेद था राष्ट्रीयता की धारणा पर। हम लोगों की यह मान्यता थी कि जो भारतीय राष्ट्र है, उसमें हिन्दुस्तान में रहने वाले सभी लोगों को समान अधिकार हैं, लेकिन RSS के लोगों और सावरकर ने हिन्दू राष्ट्र की कल्पना सामने रखी।
जिन्ना भी इसी किस्म की सोच के शिकार थे। उनका मानना था कि भारत में मुस्लिम राष्ट्र और हिन्दू राष्ट्र दो राष्ट्र हैं और सावरकर भी यही कहते थे।

● दूसरा महत्वपूर्ण मतभेद यह था कि हम लोग लोकतांत्रिक गणराज्य की स्थापना करना चाहते थे और RSS के लोग लोकतंत्र को पश्चिम की विचारधारा मानते थे और कहते थे कि वह भारत के लिए उपयुक्त नहीं है। उन दिनों RSS के लोग हिटलर की बहुत तारीफ करते थे।

गोलवलकर के विचारों में और नाजी लोगों के विचारों में आश्चर्यजनक साम्य है। गोलवलकर की एक किताब है ‘वी एंड ऑवर नेशनहुड डिफाइंड’ जिसका चतुर्थ संस्करण 1947 में प्रकाशित हुआ था, उसमें वे एक जगह कहते हैं—”हिन्दुस्तान के सभी गैर हिन्दू लोगों को हिन्दू संस्कृति और भाषा अपनानी होगी, हिन्दू धर्म का आदर करना और हिन्दू जाति और संस्कृति के गौरव-गान के अलावा कोई और विचार अपने मन में नहीं लाना होगा…

एक वाक्य में कहें तो वे विदेशी होकर रहना छोड़ें नहीं तो उन्हें हिन्दू राष्ट्र के अधीन होकर ही यहां रहने की अनुमति मिलेगी, विशेष सुलूक की तो बात ही अलग, उन्हें कोई लाभ नहीं मिलेगा, उनके कोई विशेषाधिकार नहीं होंगे, यहां तक कि नागरिक अधिकार भी नहीं।”

तो गोलवलकर करोड़ों हिन्दुस्तानियों को गैर-नागरिक के रूप में देखना चाहते थे। उनके नागरिकता के सारे अधिकार छीन लेना चाहते थे और यह कोई उनके नए विचार नहीं हैं।

जब हम लोग कॉलेज में पढ़ते थे, उस समय से RSS वाले हिटलर के आदर्शों पर ले चलना चाहते थे। उनका मत था कि हिटलर ने यहूदियों की जो हालत की थी, वही हालत यहां मुसलमानों और ईसाइयों की करनी चाहिए।

नाजी पार्टी के विचारों के प्रति गोलवलकर की कितनी हमदर्दी है, यह उनकी ‘वी’ नामक पुस्तिका के पृष्ठ 42 से मैं जो उदाहरण दे रहा हूं, उससे स्पष्ट हो जाएगा…
“जर्मनी ने जाति और संस्कृति की विशुद्धता बनाये रखने के लिए सैमेटिक यहूदियों की जाति का सफाया कर पूरी दुनिया को स्तंभित कर दिया था। इससे जातीय गौरव के चरम रूप की झांकी मिलती है। जर्मनी ने यह भी दिखला दिया कि जड़ से ही जिन जातियों और संस्कृतियों में अंतर होता है, उनका एक संयुक्त घर के रूप में विलय असंभव है। हिन्दुस्तान में सीखने और बहस करने के लिए यह एक सबक है।”

आप यह कह सकते हैं कि वह एक पुरानी किताब है, जब भारत आजाद हो रहा था उस समय की किताब है लेकिन इनकी दूसरी किताब है—‘ए बंच ऑफ थॉट्स’ उससे उदाहरण दे रहा हूं, उसके ‘लोकप्रिय संस्करण’ से, जो नवंबर 1966 में प्रकाशित हुआ। इसमें गोलवलकर ने आंतरिक खतरों की चर्चा करते हुए 3 आंतरिक खतरे बताये हैं। एक, मुसलमान, दूसरे ईसाई और तीसरे कम्युनिस्ट।

सभी मुसलमान, सभी ईसाई और सभी कम्युनिस्ट भारत के लिए खतरा हैं, यह राय है गोलवलकर की। इस तरह की है इनकी विचारधारा।

● गोलवलकर के साथ, मतलब RSS के साथ, हमारा तीसरा मतभेद यह है कि गोलवलकर और RSS वर्णव्यवस्था के समर्थक हैं और मेरे जैसे समाजवादी वर्ण-व्यवस्था के सबसे बड़े दुश्मन हैं। मैं अपने को ब्राह्मणवाद और वर्ण-व्यवस्था का सबसे बड़ा शत्रु मानता हूं।

मेरी यह निश्चित मान्यता है कि जब तक वर्ण-व्यवस्था और उसके ऊपर आधारित विषमताओं का नाश नहीं होगा, तब तक भारत में आर्थिक और सामाजिक समानता नहीं बन सकती है लेकिन गोलवलकर कहते हैं कि…”हमारे समाज की दूसरी विश्ष्टिता थी वर्ण-व्यवस्था, जिसे आज जातिप्रथा कह कर उपहास किया जाता है।” वे आगे कहते हैं कि….
“समाज की कल्पना सर्वशक्तिमान ईश्वर की चतुरंग अभिव्यक्ति के रूप में की गयी थी, जिसकी पूजा सभी को अपने-अपने ढंग से और अपनी-अपनी योग्यता के अनुसार करनी चाहिए। ब्राह्मण को इसलिए महान माना जाता था, क्योंकि वह ज्ञान-दान करता था। क्षत्रिय भी उतना ही महान माना जाता था, क्योंकि वह शत्रुओं का संहार करता था। वैश्य भी कम महत्वपूर्ण नहीं था, क्योंकि वह कृषि और वाणिज्य के द्वारा समाज की आवश्यकताएं पूरी करता था और शूद्र भी, जो अपने कला-कौशल से समाज की सेवा करता था।”

इसमें बड़ी चालाकी से शूद्रों के बारे में कहा गया है कि वे अपने हुनर और कारीगरी के द्वारा समाज की सेवा करते हैं लेकिन इस किताब में चाणक्य के जिस अर्थशास्त्र की गोलवलकर ने तारीफ की है, उसमें यह लिखा है कि…”ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यों की सेवा करना शूद्रों का सहज धर्म है।” इसकी जगह पर गोलवलकर ने चालाकी से जोड़ दिया—”समाज की सेवा।”

● हमारे मतभेद का चौथा बिंदु है—भाषा। हम लोग लोक-भाषा के पक्ष में हैं। सारी लोकभाषाएं भारतीय हैं लेकिन गोलवलकर की क्या राय है? उनकी यह राय है कि बीच में सुविधा के लिए हिंदी को स्वीकारो लेकिन अंतिम लक्ष्य राष्ट्र की भाषा संस्कृत हो।

‘बंच आफ थॉट्स’ में उन्होंने कहा है, ‘संपर्क भाषा की समस्या के समाधान के रूप में जब तक संस्कृत स्थापित नहीं हो जाती, तब तक सुविधा के लिए हमें हिन्दी को प्राथमिकता देनी होगी।’ सुविधा के लिए हिन्दी, लेकिन अंत में वे संपर्क-भाषा चाहते हैं संस्कृत!

हमारे लिए यह शुरू से मतभेद का विषय रहा। महात्मा गांधी की तरह, लोकमान्य तिलक की तरह हम लोग लोक-भाषाओं के समर्थक रहे। हम किसी के भी ऊपर हिन्दी लादना नहीं चाहते लेकिन हम चाहते हैं कि तमिलनाडु में तमिल चले, आंध्र में तेलुगु चले, महाराष्ट्र में मराठी चले, पश्चिम बंगाल में बंगला भाषा चले। अगर गैर-हिन्दी भाषी राज्य अंगरेजी का इस्तेमाल करना चाहते हैं तो वे करें। हमारा उनके साथ कोई मतभेद नहीं लेकिन संस्कृत इने-गिने लोगों की भाषा है, एक विशिष्ट वर्ग की भाषा है। संस्कृत को राष्ट्रीय भाषा का दर्जा देने का मतलब है देश में मुट्ठी भर लोगों का वर्चस्व जो हम नहीं चाहते।
● पांचवीं बात, राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन में संघीय-राज्य की कल्पना को स्वीकार किया गया था। संघराज्य में केन्द्र के जिम्मे निश्चित विषय होंगे। उनके अलावा जो विषय होंगे, वे राज्यों के अंर्तगत होंगे लेकिन मुल्क के विभाजन के बाद राष्ट्रीय नेता चाहते थे कि केन्द्र को मजबूत बनाया जाये, इसलिए संविधान में एक समवर्ती सूची बनायी गयी। इस समवर्ती सूची में बहुत सारे अधिकार केन्द्र और राज्य दोनों को दिये गये और जो वशिष्ट अधिकार हैं वे पहले तो राज्य को मिलने वाले थे, लेकिन केन्द्र को मजबूत करने के लिए केन्द्र को दे दिये गये। बहरहाल, संघराज्य बन गया लेकिन RSS और गोलवलकर ने हमेशा भारतीय संविधान के इस आधारभूत तत्व का विरोध किया।

ये लोग ‘ए यूनियन ऑफ स्टेट्स ’ अर्थात संघराज्य की कल्पना की खिल्ली उड़ाते हैं और कहते हैं कि हिन्दुस्तान में संघराज्य वाले संविधान को खत्म कर देना चाहिए। गोलवलकर ‘बंच ऑफ थाट्स’ में कहते हैैं…
“संविधान का पुनरीक्षण होना चाहिए और इसका पुन: लेखन कर शासन की एकात्मक प्रणाली स्थापित की जानी चाहिए।”

गोलवलकर एकात्मक प्रणाली यानी केन्द्रानुगामी शासन चाहते हैं। वे कहते हैं कि ये राज्य वगैरह सब खत्म होने चाहिए। इनकी कल्पना है कि एक देश, एक राज्य, एक विधायिका और एक कार्यपालिका। यानी राज्यों के विधानमंडल, राज्यों के मंत्रिमंडल सब समाप्त।

यानी ये लोग डंडे के बल पर अपनी राजनीति चलायेंगे। अगर डंडा (राजदंड) इनके हाथ में आ गया, तो ये केन्द्रानुगामी शासन स्थापित करके छोड़ेंगे।

इसके अलावा स्वतंत्रता आंदोलन का राष्ट्रीय झंडा था तिरंगा। तिरंगे झंडे की इज्जत के लिए, शान के लिए सैकड़ों लोगों ने बलिदान दिये, हजारों लोगों ने लाठियाँ खायीं लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि RSS कभी भी तिरंगे झंडे को राष्ट्रीय ध्वज नहीं मानता। वह तो भगवा ध्वज को ही मानता था और कहता था, भगवा ध्वज हिन्दू राष्ट्र का प्राचीन झंडा है। हमारा वही आदर्श है, हमारा वही प्रतीक है।

जिस तरह संघराज्य की कल्पना को गोलवलकर अस्वीकार करते थे, उसी तरह लोकतंत्र में भी उनका विश्वास नहीं था। लोकतंत्र की कल्पना पश्चिम से आयात की हुई कल्पना है और पश्चिम का संसदीय लोकतंत्र भारतीय विचार और संस्कृति के अनुकूल नहीं है, ऐसी उनकी धारणा है।

जहां तक समाजवाद का सवाल है, उसको तो वे सर्वथा परायी चीज मानते थे और कहते थे कि यह जितने ‘इज़्म’ हैं यानी डेमोक्रेसी हो या समाजवाद, ये सब विदेशी हैं और इनका त्याग करके हमको भारतीय संस्कृति के आधार पर समाज रचना करनी चाहिए।

जहां तक हमारे जैसे लोगों का सवाल है, हम लोग तो संसदीय लोकतंत्र में विश्वास रखते हैं, समाजवाद में विश्वास रखते हैं और यह भी चाहते हैं कि शांतिपूर्ण ढंग से और महात्मा जी के सृजनात्मक सिद्धांत को अपना कर हम लोकतंत्र की प्रतिष्ठापना करें, सामाजिक संगठन करें और समाजवाद लायें।

जब कांग्रेस के एकतंत्रीय शासन के खिलाफ हमारी लड़ाई चल रही थी, तो हमारे नेता डॉ. राममनोहर लोहिया कहते थे कि ‘जिस कांग्रेस ने चीन के हाथ भारत को अपमानित करवाया, उस कांग्रेस को हटाने के लिए और देश को बचाने के लिए हमको विपक्ष के सभी राजनीतिक दलों के साथ तालमेल बैठाना चाहिए।’

इस विषय पर डॉक्टर साहब से मेरी बहुत चर्चा होती थी। 2 साल तक बहस चली। आखिर तक मैं यह कहता रहा कि RSS और जनसंघ के साथ हमारा तालमेल नहीं बैठेगा। अंत में डॉक्टर साहब ने कहा कि मेरे नेतृत्व को तुम मानते हो या नहीं? मैंने कहा, “हाँ, मैं मानता हूँ।” वे बोले, “क्या यह जरूरी है कि सभी प्रश्नों पर तुम्हारी और मेरी राय मिले या सभी प्रश्नों पर मैं तुमको सहमत करूं? एक-आध प्रश्न ऐसा भी रहे जो हम दोनों के बीच मतभेद का विषय हो और मैं तो इस तरह का तालमेल चाहता हूँ कि एक बड़े दुश्मन को हराने के लिए, तो इस मामले में तुम मान जाओ, इसको ‘ट्रायल’ दे दो। हो सकता है मेरी बात सही निकले, यह भी हो सकता है तुम्हारी बात सही निकले।” लेकिन मेरी यह मान्यता रही है कि अंत में RSS और डॉ. राममनोहर लोहिया की विचारधारा में संघर्ष होकर रहेगा।

जब इंदिरा गांधी ने हमारे ऊपर इमरजेंसी लादी या वे तानाशाही की ओर बढ़ने लगीं, संजय को आगे बढ़ाने लगीं, मारुती कांड हुआ तो यह बात सही है कि इमरजेंसी के खिलाफ लड़ने के लिए लोगों ने इन लोगों के साथ तालमेल बिठाया। लोकनायक जयप्रकाश जी कहते थे कि एक पार्टी बनाये बिना हम लोग इंदिरा और तानाशाही को नहीं हटा सकते। चौधरी चरण सिंह की भी यही राय थी कि एक पार्टी बने।

हम लोग जब जेल में थे, यह पूछा गया था कि एक पार्टी बनाने के बारे में और चुनाव लड़ने के बारे में आपकी क्या राय है? मुझे याद है कि मैने यह संदेश जेल में भेजा था कि मेरी राय में चुनाव लड़ना चाहिए। चुनाव में करोड़ों लोग हिस्सा लेंगे। चुनाव एक गतिशील चीज है। चुनाव अभियान जब जोर पर आएगा, तो इमरजेंसी के जितने बंधन हैं वे सब टूट जाऐंगे और लोग अपने लोकतांत्रिक अधिकारों का इस्तेमाल करेंगे। इसीलिए मेरी राय थी कि चुनाव लड़ना चाहिए।

अब चूंकि लोकनायक जयप्रकाश नारायण और सभी लोगों की यह राय थी कि एक पार्टी बनाए बिना हम लोगों को सफलता नहीं मिलेगी, तो हम लोगों ने भी इसके लिए मान्यता दे दी थी लेकिन मैं कहना चाहता हूं कि यह समझौता दलों के बीच हुआ था—जनसंघ, सोशलिस्ट पार्टी, संगठन कांग्रेस, भालोद और कुछ विद्रोही कांग्रेसी।

RSS के साथ न हमारा कोई करार हुआ न RSS की कोई शर्त मानी गई। बल्कि जेलों में हमारे बीच मनु भाई पटेल का एक परिपत्र प्रसारित किया गया था, उससे तो हमें यह पता चला कि चौधरी चरण सिंह ने 7 जुलाइ, 1976 को RSS की सदस्यता और जो नयी पार्टी बनेगी उसकी सदस्यता इन दोनों में मेल होगा या टकराव, इसकी चर्चा उठायी थी। जनसंघ के उस समय के कार्यकारी महासचिव ओमप्रकाश त्यागी ने स्पष्ट शब्दों में कहा था कि नयी पार्टी जो शर्त लगाना चाहे लगा सकती है। फिलहाल RSS के ऊपर तो पाबंदी है, RSS को भंग किया जा चुका है, इसलिए RSS का तो सवाल ही नहीं उठता।

बाद में जब हम लोग पार्टी का नया संविधान बना रहे थे, तो हमारी संविधान उपसमिति ने एक सिफारिश की थी कि ऐसे किसी संगठन के सदस्य को, जिसके उद्देश्य, नीतियों और कार्यक्रम जनता पार्टी के उद्देश्य, नीतियों और कार्यक्रम से मेल नहीं खाते, पार्टी का सदस्य नहीं बनने देना चाहिए। इसका विरोध करने की किसी को भी कोई आवश्यकता नहीं थी। यह तो एक बिल्कुल सामान्य बात थी लेकिन यह विचारणीय बात है कि अकेले सुंदरसिंह भंडारी ने इसका विरोध किया। बाकी सभी सदस्यों ने, इनमें रामकृष्ण हेगड़े भी थे, श्रीमती मृणाल गोरे थीं, श्री बहुगुणा थे, श्री वीरेन शाह थे और मैं स्वयं था, मिलकर एक राय से यह प्रस्ताव लिया था कि हम सुंदरसिंह भंडारी का विरोध करेंगे।

1976 के दिसंबर महीने में इस पर विचार करने के लिए जब बैठक हुई, तो अटल जी ने जनसंघ और RSS की ओर से एक पत्र लिखा था राष्ट्रीय समिति को, जिसमें उन्होंने यह चर्चा की थी कि कुछ नेताओं में इस पर आपसी रजामंदी थी कि RSS का सवाल नहीं उठाया जा सकता लेकिन कई नेताओं ने मुझे बताया कि इस तरह कि कोई रजामंदी नहीं थी और इस तरह का कोई वचन नहीं दिया गया था, क्योंकि उस समय तो RSS सामने था ही नहीं।

मैं यह कहना चाहता हूँ कि मैं उस वक्त जेल में था और अगर ऐसा कोई गुप्त करार था भी, तो मैं उसका भागीदार नहीं हूँ।

जनता पार्टी का जो चुनाव घोषणा-पत्र बना, मैं बिल्कुल सफाई के साथ कहना चाहता हूँ कि उस पर RSS की विचारधारा का जरा भी असर नहीं था, बल्कि एक-एक मुद्दे को सफाई के साथ स्पष्ट किया गया था। क्या यह बात सही नहीं है कि जनता पार्टी का चुनाव घोषणा-पत्र धर्मनिरपेक्षता, लोकतंत्र और गांधीवादी मूल्यों पर आधारित समाजवादी समाज की चर्चा करता है? उसमें हिन्दू राष्ट्र का कहीं कोई उल्लेख नहीं? अल्पसंख्यकों के अधिकारों की, समान अधिकार की चर्चा और यह भी कहा गया है कि उनके अधिकारों की पूरी रक्षा की जायेगी और गोलवलकर तो कहते हैं कि जो अल्पसंख्यक लोग हैं उनको नागरिकता के भी अधिकार नहीं रहने चाहिए! उनको हिन्दू राष्ट्र के बिल्कुल अधीन होकर रहना पड़ेगा।

जनता पार्टी विकेद्रीकरण की बात करने वाली और गोलवलकर घोर केन्द्रीकरणवादी थे। वे तो राज्यों को ही समाप्त करना चाहते थे, राज्य विधान मंडलों को ही समाप्त करना चाहते थे, राज्य के मंत्रिमंडलों को समाप्त करना चाहते थे लेकिन जनता पार्टी ने तो विकेंद्रीकरण की चर्चा की। यानी राज्यों की स्वायत्ता पर जनता पार्टी आक्रमण नहीं करना चाहती।

समाजवाद की चर्चा की गयी, समाजिक न्याय की चर्चा की गयी, समानता की चर्चा की गयी। क्या जनता पार्टी ने अपने चुनाव घोषणा-पत्र में यह कहा था कि वर्ण-व्यवस्था रहेगी और शूद्रों को दूसरों की सेवा में ही अपना जीवन बिताना चाहिए? जनता पार्टी ने तो यह कहा था कि पिछड़ों को हम लोग पूरा मौका देंगे, इतना ही नही, विशेष अवसर देंगे और यह कहा था कि उनके लिए सरकारी सेवाओं में 25 से 33% तक आरक्षण दिया जायेगा।

हां, यह बात सही है कि RSS के लोगों ने दिल से इस चुनाव घोषणा-पत्र को नहीं स्वीकारा।
मेरी यह शिकायत रही और कुशाभाऊ ठाकरे को एक पत्र में मैंने कहा भी था कि मेरी तरफ से शिकायत यह है कि चर्चा के दौरान आप बहुत जल्दी चीजों को मान जाते हैं लेकिन दिल से नहीं मानते। इसलिए आपके बारे में शक पैदा होता है। यह मैंने उनको बहुत पहले कहा था और मेरे मन में RSS के बारे में शुरू से संदेह रहे। डॉक्टर साहब के जमाने से रहे लेकिन इसके बावजूद तानाशाही के खिलाफ लड़ने के लिए हम लोगों ने जरूर उनसे तालमेल किया।

लोकनायक जयप्रकाश जी की यह इच्छा थी कि एक पार्टी बने। तो चूंकि चुनाव घोषणा-पत्र में किसी तरह का समझौता नहीं किया गया था, इसलिए हमने इस बात को स्वीकार कर लिया लेकिन साथ-ही-साथ मैं कहना चाहता हूँ कि मैं शुरू से इसके बारे में बिल्कुल स्पष्ट था अपने मन में कि अगर जनता पार्टी को एकरस होकर, एक सुसंबद्ध पार्टी के रूप में काम करना है, तो दो काम अवश्य करने पड़ेंगे। नंबर एक, RSS वालों को अपनी विचारधारा बदलनी पड़ेगी और धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र की कल्पना को स्वीकारना पड़ेगा। नंबर दो, RSS के परिवार के जो संगठन हैं जैसे भारतीय मजदूर संघ, विद्यार्थी परिषद आदि इन संगठनों को अपना अलग अस्तित्व समाप्त करना पड़ेगा और जनता पार्टी के समानधर्मी संगठनों के साथ अपने को विलीन करना पड़ेगा। इसके बारे में मैं शुरू से ही स्पष्ट था और चूंकि मुझे जनता पार्टी के मजदूर और युवा संगठनों की देख-रेख का भार दिया गया था, मैंने यह लगातार कोशिश की कि विद्यार्थी परिषद अपने अस्तित्व को मिटाये, भारतीय मजदूर संघ अपने अस्तित्व को मिटाये लेकिन ये लोग अपनी स्वायत्ता की चर्चा करने लगे।

वस्तुत: ये लोग हमेशा नागपुर के आदेश से चलते हैं, एक चालकानुवर्तित्व का सिद्धांत मानते हैं।

मैं गोलवलकर का ही उदाहरण देता हूँ। उन्होंने यह कहा कि हम लोग इस तरह का मन बनाते हैं कि वह बिलकुल अनुशासित होता है और जो हम लोग कहेंगे वही सब लोग मानते हैं। इनके संगठन का एक ही सूत्र है, एक चालकानुवर्तित्व। ये लोकतंत्र को नहीं मानते। बहस में भी इनका विश्वास नहीं। इनकी कोई आर्थिक नीति नहीं है। उदाहरण के लिए…
गोलव ने अपने ‘बंच आफॅ थॉट्स’ में इस बात पर खेद प्रकट किया है कि जमींदारी प्रथा का उन्मूलन किया गया है। जमींदारी के खत्म होने पर गोलवलकर को बड़ी तकलीफ है, बड़ी पीड़ा है लेकिन गरीबों के लिए उनके मन में दर्द नहीं है।

मैंने RSS वालों से कहा कि आपको हिन्दू संगठन की कल्पना छोड़ कर सभी मत व संप्रदायों के लोगों को अपनी संस्था में स्थान देना पड़ेगा। आपके जो वर्ग-संगठन हैं, उनको जनता पार्टी के दूसरे वर्ग संगठन के साथ मिला देना पड़ेगा। तो उन लोगों ने कहा कि यह इतना जल्दी कैसे होगा। बड़ी दिक्कतें है, लेकिन हम धीरे-धीरे बदलना चाहते हैं। वे इस तरह की गोलमोल बातें करते रहते थे। उनके आचरण को देखकर मैं इस नतीजे पर पहुंचा कि उनको बदलना है नहीं। खासकर 1977 के जून के विधानसभा चुनावों के बाद जब उनके हाथ में चार राज्यों और एक केन्द्र शासित प्रदेश का शासन आ गया तथा उत्तर प्रदेश और बिहार में उनको बहुत बड़ी हिस्सेदारी मिल गयी, तो इसके बाद वे सोचने लगे कि अब हमको बदलने की क्या जरूरत है। हम लोगों ने चार राज्यों को फतह कर लिया है, धीरे-धीरे अन्य राज्यों को करेंगे, फिर केन्द्र भी हमारे हाथ में आयेगा। बाकी जो नेता हैं वे बुड्ढे हैं, आज नहीं तो कल मर जायेंगे और किसी नये व्यक्ति को हम नेता बनने नहीं देंगे।

इसलिए आपने देखा होगा ‘ऑर्गनाइजर’, पांचजन्य आदि सभी अखबारों में जनता पार्टी के किसी भी नेता को उन्होंने नहीं बख्शा। मेरे उपर तो उनका विशेष अनुग्रह रहा है, विशेष कृपा रही है। मुझे गाली देने में अपने अखबारों का जितना स्थान उन्होंने खर्च किया उतना तो शायद इंदिरा गांधी को भी गाली देने के लिए नहीं किया होगा।

एक अरसे तक इन लोगों से मेरी बातचीत होती रही। एक दफा तो मुझे याद है मेरे घर बंबई में बाला साहब देवरस आये। फिर उसके बाद 71 के चुनाव के बाद एक दफा मैं उनसे मिला। इमर्जेंसी के पहले एक दफा माधवराव मुले से मेरी बातचीत हुई। चौथी बार माधवराव मुले और बाला साहब देवरस से मई 1977 में मेरी बात हुई थी। तो ऐसा कोई नहीं कह सकता कि मैंने उनसे चर्चा नहीं की थी, लेकिन मैं इस नतीजे पर पहुँचा कि उनके दिमाग का किवाड़ बंद है और उसमें कोई नया विचार पनप नहीं सकता। बल्कि RSS की यह विशेषता रही है कि वह बचपन में ही लोगों को एक खास दिशा में मोड़ देता है। पहला काम वे यही करते हैं कि बच्चों की, युवकों की विचार प्रक्रिया को ‘फ्रीज़’ कर देते हैं, जड़ बना देते हैं। उसके बाद कोई नया विचार वे ग्रहण ही नहीं कर पाते।

तो कोशिश मैंने की। एक बार मैंने ट्रेड यूनियन कार्यकर्ताओं की बैठक बुलायी। जनता पार्टी के सभी संगठनोंं के प्रतिनिधि उसमें आये लेकिन भारतीय मजदूर संघ ने उसका बहिष्कार किया। इतना ही नहीं, अकारण मुझे गालियां भी दीं। विद्यार्थी परिषद और युवा मोर्चा के साथ भी विलीनीकरण की बात चलायी गयी लेकिन वे लोग हमेशा अलग रहे, क्योंकि RSS अपने को ‘सुपर पार्टी’ के रूप में चलाना चाहता है। यह लोग जीवन के हर अंग को न केवल छूना चाहते हैं, बल्कि उस पर कब्जा करना चाहते हैं।

जार्ज फर्नांडिस ने उसी समय लेख लिखा ‘इंडियन एक्सप्रेस’ में, उसमें उन्होंने इसी विचार को ले कर दत्तोपंत ठेंगडी का एक उदाहरण दिया लेकिन दत्तोपंत ठेंगड़ी ने कहा कि पूरे समाज में हम लोग छा जाना चाहते हैं, जीवन का कोई पहलू हम लोग छोड़ेंगे नहीं। सब पर कब्जा करेंगे, यह कोई नया विचार नहीं है ठेंगड़ी का। यह तो ‘वी’ और ‘बंच ऑफ थॉट्स’ में गोलवलकर ने जगह-जगह पर कहा है और कोई भी सर्वसत्तावादी संगठन जीवन के किसी भी पहलू को स्वतंत्र नहीं छोड़ना चाहता। वह कला पर छा जायेगा, संगीत पर छा जायेगा, अर्थनीति पर छा जायेगा, संस्कृति पर छा जायेगा। फासिस्ट संगठन का यही तो धर्म है!

दरअसल, ये लोग हमारी जनता पार्टी पर कब्जा करना चाहते थे। ये लोग सरकारों पर कब्जा करना चाहते थे। एकसाथ इन्होंने कई नेताओं को लालच दिखाया था प्रधानमंत्री बनने का। इधर ये मोरारजी भाई को भी अंत तक कहते रहे कि आप ही को रखेंगे हम लोग। ये चरण सिंह को भी बीच-बीच में कहते थे कि आप को बनायेंगे। ये जगजीवन राम को भी कहते थे कि हम आप ही को बनायेंगे। ये चंद्रशेखर को भी कहते थे। ये जार्ज फर्नांडिस को भी कहते थे। हां, उन्होंने कभी मुझे यह कहने का साहस नहीं किया।

एक दफा अटल जी से मैंने कहा, तो उन्होंने कहा, “नानाजी ने ना केवल तुमको, बल्कि मुझको भी कभी नहीं कहा। न वे आपको बनाना चाहते हैं न कभी मुझको बनाना चाहते हैं।” ऐसा मजाक में अटल जी ने मुझसे कहा।

बहरहाल, वे मुझसे इसलिए इस तरह की बात नहीं करते थे क्योंकि मैं न किसी की वंचना करता हूं न किसी के द्वारा वंचित होता हूँ। वे सोचते हैं इसको बेवकूफ नहीं बनाया जा सकता, तो इसको कहने से क्या फायदा? यह तो और सावधान हो जाएगा।

ये लोग समय-समय पर क्या कहते हैं, उसका कोई मूल्य नहीं। क्या RSS के नेताओं ने कहा है कि गोलवरकर के जो विचारों को हमने त्याग दिया? सिर्फ अटल जी कहते हैं कि राष्ट्रीयता, लोकतंत्र, समाजवाद, सामाजिक न्याय आदि धारणाओं को स्वीकारना चाहिए, उसके बिना अब नहीं चला जा सकता। पर यह केवल अटल जी कहते हैं। बाकी संधियों पर तो मेरा विश्वास ही नहीं।

ये लोग जेल से रिहाई हासिल करने के लिए माफी मांगते थे। इंदिरा गांधी का सुप्रीम कोर्ट में राजनारायण वाला केस जीतने पर बाला साहब देवरस ने अभिनंदन किया था। तो इन लोगों के वचनों पर मेरा विश्वास नहीं है।

मेरी स्पष्ट राय है कि अगर वे RSS के नेताओं को पार्टी से, राष्ट्रीय समिति से निकाल देते,
उनके सदस्यों पर पाबंदी लगा देते विशेषकर नानाजी, सुंदर सिंह भंडारी एंड कंपनी को पार्टी से निकाल देते, तभी मैं विश्वास कर सकता था।
—————————————–
★ प्रखर समाजवादी चिंतक मधु लिमये भारतीय स्वतंत्रता संग्राम और गोवा मुक्ति संग्राम के सेनानी थे। संसदीय राजनीति में उनका विशेष योगदान रहा है। डॉ. लोहिया के साथी थे। जनता पार्टी के गठन और उसकी विचारधारा व घोषणा-पत्र तैयार करने में उनकी विशेष भूमिका रही।

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