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बेरमो विधानसभा उपचुनाव

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बेरमो विधानसभा उपचुनाव
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कांग्रेस मुश्किल में और भाजपा में भीतरघात की आशंका

झारखंड के औद्योगिक क्षेत्र में स्थित बेरमो विधानसभा सीट पर 3 नवंबर को होने वाले उपचुनाव में कांग्रेस कांटे की लड़ाई में फंसी हुई नजर आ रही है। 2019 के चुनाव में विजयी इंटक से संबद्ध श्रमिक नेता राजेंद्र सिंह की मृत्यु से रिक्त इस सीट पर कब्जा बरकरार रखना कांग्रेस के लिए बेहद कठिन चुनौती है।

कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी समस्या इसके उम्मीदवार मरहूम राजेंद्र सिंह के पुत्र जयमंगल सिंह ही साबित हो रहे हैं। इनके अहंकारी तथा दबंग स्वभाव के कारण पार्टी कार्यकर्ताओं में ही असंतोष है।‌ जयमंगल सिंह अपना चुनाव प्रचार स्वजातीय राजपूत समाज के समर्थकों के बूते कर रहे हैं। आम और खास कांग्रेसी कार्यकर्ताओं के सलाह की उपेक्षा हो रही है।‌

बेरमो विधानसभा चुनाव में शुरू से ही सबसे अहम मुद्दा बाहरी बनाम भीतरी का रहता है। बाहरी वे लोग हैं जो बेरमो में स्थित कोयला खदानों में कार्यरत तथा शेष कोयला एवं अन्य प्रकार के कारोबारी हैं। इनमें 90% से अधिक बिहार और उत्तर प्रदेश से आए राजपूत जाति के ही लोग हैं। बताया जाता है कि बाहरी मतदाता 20% के आसपास हैं। राजेंद्र सिंह भी मूलतः बिहार के थे। इस नाते उनके सुपुत्र जयमंगल पर भी बाहरी का ठप्पा है।

भाजपा ने काफी मंथन के बाद अपने पुराने घोड़े योगेश्वर महतो बाटुल पर ही दांव लगाया है। दो बार बेरमो का प्रतिनिधित्व कर चुके बाटुल की छवि एक बेहद अकर्मण्य जन प्रतिनिधि की रही है, पर बावजूद इसके स्थानीय होने के कारण उन्हें ग्रामीण मतदाताओं का लगभग एकतरफा समर्थन मिलता दिख रहा है।

कांग्रेस को 20% राजपूत मतों के अतिरिक्त लगभग 20% मुस्लिम मतदाताओं का एकतरफा समर्थन मिलेगा, यह तय है। 5% के करीब आदिवासी मतदाताओं का समर्थन भी मायने रखता है। ईसाई आदिवासियों का झुकाव स्वाभाविक रूप से कांग्रेस की तरफ है, पर यही बात सरना आदिवासियों के बारे में नहीं कही जा सकती। आर एस एस के सरना आदिवासियों के बीच काम का लाभ निश्चित ही भाजपा को मिलेगा।

इस कांटे की टक्कर में कई बार भाजपा के सांसद रहे और 2019 में बेटिकट कर दिए गए रविंद्र पांडेय की भूमिका महत्वपूर्ण साबित हो सकती है। उपचुनाव में रविंद्र पांडेय भी टिकट के मजबूत दावेदार थे पर भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने उन्हें फिर से निराश किया। आहत पांडेय ने चुनाव में चुप्पी साध रखी है। कांग्रेस की उम्मीद पांडेय जी की नाराजगी पर ही जिंदा है। दिलचस्प तथ्य यह है कि दिवंगत राजेंद्र सिंह और रविंद्र पांडेय के बीच एक अलिखित राजनीतिक समझौता था। इस समझौते के तहत लोकसभा चुनाव में राजेंद्र सिंह के समर्थक रविंद्र पांडेय को वोट करते थे तथा विधानसभा चुनाव में रविंद्र पांडेय समर्थकों का वोट राजेंद्र सिंह को मिलता था। जयमंगल सिंह की उम्मीदें इस समझौते पर टिकी हैं।

कांग्रेस के लिए सुकून की बात यह भी है कि आम लोगों के बीच हेमंत सरकार की छवि ठीक-ठाक है। यानी कोई नाराजगी नहीं है। अगर मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन तथा वित्त मंत्री रामेश्वर उरांव एक-दो दिन लंगर डाल दें तो स्थानीय (भीतरी) मतदाताओं का रूख बदल सकता है।

दो वोटकटवा उम्मीदवार भाजपा की परेशानी बढ़ा रहे हैं। विभिन्न दलों की यात्रा करते रहने वाले पूर्व मंत्री लालचंद महतो अबकी बसपा के टिकट पर खड़े हैं। भाकपा ने धनेश्वर महतो को टिकट दिया है। महतो बिरादरी के ये दोनों उम्मीदवार जितने भी वोट लाएंगे, खालिस नुकसान भाजपा को ही होगा। बेरमो के महतो मतदाता भाजपा समर्थक माने जाते हैं।

यह तो हुई स्थानीय राजनीतिक समीकरणों की बात। लेकिन इस उपचुनाव में हेमंत सरकार की प्रतिष्ठा भी दांव पर लगी हुई है। इसलिए सत्तारूढ़ गठबंधन कभी नहीं चाहेगा कि भाजपा चुनाव जीत कर सरकार के अस्तित्व को चुनौती पेश करे।
अशोक वर्मा

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