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Saturday, June 19, 2021

भारत मे बेरोजगारी क्यो हैं?

भारत मे बेरोजगारी क्यो हैं? 2014 में हमने चण्डीगढ में एक ग्रुप से मीटिंग की। ग्रुप में कुछ रिटायर अधिकारी और व्यापारी लोग थे जिन्होंने पैसों का एक पूल (pool) बनाया हुआ था। तकरीबन 50 करोड का वह पूल था। वे 5 स्टार्टअप ढूंढ रहे थे जिनमे प्रत्येक में 10 करोड का निवेश होना था। यह 2014 का माहौल था जब हम मनमोहन सरकार को बदलने का मन बना चुके थे। देश मे असंख्य ऐसे पूल बन रहे थे जो स्टार्टअप्स मांग रहे थे कि आईडिया लाओ। हम निवेश करेंगे। 2014 में हमने मनमोहन सरकार को बदल दिया। इसलिए बदल दिया, क्योंकि हमे विकास के दिवास्वप्न दिखाए गए। हमें और उन्नत देश और बढ़िया माहौल का सपना दिया गया। देश की अर्थव्यवस्था रोजगार उन्मुख अर्थव्यवस्था थी, लेकिन उदारीकरण के पुरोधा मनमोहन सिंह की नीतियों से हम पूरी तरह सहमत नही थे औऱ समझते थे कि संघ प्रायोजित भाजपा सरकार के पास विकास का कोई स्वदेशी मॉडल होगा। रैलियों में मोदी जी के भाषण बेहद उम्मीद जगाते थे। मनमोहन सरकार से अलग मनमोहन सरकार से बढ़िया कोई काम औऱ अर्थिकता का हमारा अपना मॉडल हो, कौन नही चाहेगा। काला धन अर्थव्यवस्था में वापिस आये, डीजल पैट्रोल सस्ते हों, प्रत्येक नागरिक अपने आप मे बिजनेस एंटिटी की हैसियत रखे। ज्यादा से ज्यादा सफर करे घूमे रोजगार के नए अवसर खोजे, नए बिजनेस स्थापित करे। कौन न चाहेगा। देश मे हर साल बढ़ती आबादी के लिये तो ऐसा जरूरी था कि घर घर रोजगार या लघु कुटीर उद्योग पहुंचे, सरकार माल बेचने की जिम्मेदारी ले। 2016 में हमने एक प्रोजेक्ट डिज़ाइन किया। बड़ी उम्मीद में कि डायममिक सरकार है, स्किल इंडिया, मेड इन इंडिया स्टार्टअप इंडिया। एक स्वदेशी मॉडल था यह। हमने भारत सरकार के स्किल इण्डिया आफिस में बात की कि जो लिस्ट आपने जारी की है स्किल्स की उससे अलग एक काम है जिसमे हमें तकरीबन 8 लाख लोग स्किल्ड चाहिए। साढ़े छह लाख गांव हैं और उनके ऊपर कुछ अन्य लोग। कार्यालय में बैठे अधिकारी की बाँछें खिल गई । बोले फ़ाइल मूव कीजिये हम नया कोर्स शामिल कर सकते हैं। हमने फ़ाइल मूव कर दी। यह अक्टूबर 2016 का वाक्या है। नवम्बर 2016 में मोदी जी ने नोटबन्दी का एलान कर दिया। हम सब हैरान कि देश की सरकार इतना अजीब औऱ आत्मघाती फैसला कैसे ले सकती है। उनकी हिन्दू मुस्लिम राजनीत अलग चीज है कि सत्ता प्राप्ति के लिये प्रपंच रचे गए हैं लेकिन सत्ता हाथ मे है औऱ कोई देश की अर्थव्यवस्था को स्टिल स्टैंड खड़े होने के लिए कह रहा है? अब आईये 2014 वाले माहौल पर जब देश मे असंख्य लोग नए स्टार्टअप ढूंढ़ रहे थे। 2016 में तमाम स्टार्टअप धराशायी होने लगे। वित्त पोषक तो बहुत डरी हुई कौम होती है, वे 2016 में ही इधर उधर दुबक गए। देश का युवा स्टार्टअप प्रोजेक्ट लेकर देश भर में वित्तीय संस्थानों के पास घूमता रहा लेकिन उन्हें धन नही मिला। एक दिन बैंक की हड़ताल होने पर देश को करोड़ो का नुकसान होता है , यहां तो 50 दिन पूरी अर्थव्यवस्था ब्लॉक रही। अर्थव्यवस्था जब खुली तब उसमे खुलने जैसा आत्मविश्वास औऱ आपसी विश्वास नही बचा था। वित्तिय साइकल टूट गए। उसी बरस कोढ़ में खाज वाला gst बिल सरकार ले आई। जब अर्थव्यवस्था बेहद संकट में थी तब gst लाने की जिद पर जेटली जी अड़ गए। तब हमें समझ आया कि हमने मनमोहन सिंह जैसे अर्थशास्त्री को हटाकर जिन्हे गद्दी पर बिठाया है वे इस मुल्क को रसातल में ले जाएंगे। आज 2020 है। अपनी तमाम नाकामियां इस सरकार ने लोकबन्दी पर डाल दी हैं। जबकि कोई पूछे कि 45 साल में सबसे ज्यादा खराब पोजीशन औऱ विश्व मे सबसे ज्यादा गिरावट हमारी अर्थव्यवस्था में क्यो आयी जबकि लोकबन्दी तमाम देशों ने की। यूरोपीयन मुल्क तबाही के कगार पर खड़े हैं बरसो से लेकिन उनकी अर्थव्यवस्था में भी इतनी गहरी मार कोविड की वजह से नही पड़ी है। भारत जो विश्व की चौथी बड़ी अर्थव्यवस्था था वह विश्व की सातवीं अर्थव्यवस्था पर फिसल गया औऱ यह कोविड से पहले हुआ । आपकी इकॉनमी जब सिकुड़ती है तो स्वाभाविक है यह रोजगार को ही खत्म करती है सर्वप्रथम। आज खुद प्रधानमंत्री अपनी स्किल इंडिया स्कीम का कहीं गुणगान नही करते। नोटबन्दी का कहीं जिक्र नही करते। सरकार का खुद का टैक्स कलेक्शन प्रभावित हुआ है। आज सरकार पेट्रोल पर से वैट हटा दे तो छह माह में देश की तमाम राज्य सरकारों के पास सैलरी देने के पैसे नही होंगे। जबकि आप तो पेट्रोल सस्ता करने और महंगाई कम करने के वादे लेकर आये थे। आपने आम आदमी के चलने पर टैक्स बढ़ा दिए हैं। ट्रांसपोर्ट महंगा हो गया है। बिजनेस की मूल चीज़े बेसिक टूल जो जनता को दिए जाने चहिये वे तक नही जानते आप। देश मे जब तक रोजगार की मिल्कियत का विकेंद्रीकरण नही करेंगे, या सरकारी कम्पनियो को आप नही बचायेंगे, देश मे रोजगार का विकास नही होगा। रोजगार की मिल्कियत के विकेन्द्रीकर्ण से अर्थ है कि कुछ गिनी चुनी कम्पनियां ही पूरे मुल्क पर काबिज न होने दी जाएं। देश के शेयर बाजार का जो इंडेक्स है उसे निफ़्टी कहते है। निफ़्टी फिफ्टी भी इसे कहा जाता है। यानी देश की लीडिंग 50 कम्पनियां जो पूरे मुल्क की जीडीपी और विकास का आईना हैं वे इसमे शामिल हैं। आप हैरान होंगें जानकर कि ये 50 कम्पनियां मिलकर कुल 1 करोड 19 लाख लोगों को रोज़गार देती हैं औऱ यह आंकड़ा 2018 का है। आज यह आंकड़ा बढ़ा नही बल्कि घटा है। विश्व का चौथा अमीर घराना रिलायंस 1 लाख 95000 लोगों को प्रत्यक्ष रोजगार देता है जबकि अकेला bsnl चार लाख लोगों को रोजगार देता था जिसकी सम्पत्ति शनै शनै रिलायंस की ही हो रही है। अर्थव्यवस्था का डिज़ाइन रोजगार पैदा करता है। उस अर्थव्यवस्था को यदि जनहित में सरकार डिज़ाइन करेगी तो रोजगार उन्मुखी अर्थव्यवस्था का मॉडल दिखेगा लेकिन यदि देश की अर्थव्यवस्था का डिज़ाइन पूंजीपतियों के हाथ है, तो उस अर्थव्यवस्था में सबसे पहले जिस चीज पर कुठाराघात होगा वह रोजगार ही है। मनमोहन सिंह पर बेशक हजार दबाव रहे होंगे लेकिन रोजगार उन्मुखी अर्थव्यवस्था उनके राजकाज में फलीभूत होते दीख रही थी।

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