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पत्रकारिता का पहला पाठ राजीव कटारा जी से चौथी दुनिया में सीखा था

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राज शेखर-

पत्रकारिता का पहला पाठ राजीव कटारा जी से चौथी दुनिया (साप्ताहिक अखबार) में सीखा था। इसी साप्ताहिक अखबार के दफ्तर में नरेंद्रपाल (एनपी सिंह) और कमेंटेटर गौस मोहम्मद से मुलाकात हुई थी। तब से हम मित्र हैं।

एनपी सिंह को भी राजीव जी ही ने निखारा। बाद में मैं मुंबई चला गया। फिर कानपुर अमर उजाला पहुंचा।

जब मैं कानपुर में था उस समय राजीव जी और सुशील राणा मेरे घर पर आए थे। राजीव जी की सलाह थी कि दिल्ली लौट आना चाहिेए। हालांकि इसमें भावुकता ज्यादा थी। उसके बाद राजीव जी के प्रयास से कई बार मैंने दिल्ली लौटने की कोशिश की लेकिन कामयाबी नहीं मिली।

जब तक मैं दिल्ली में था कमोबेश हर साप्ताहिक अवकाश के दिन रविवार को राजीव जी के घर जाता था। मेरे साथ नरेंद्रपाल भी होता था। घंटों बात करते रहते। अक्सर वहां अजय चौधरी और दीपक सिन्हा जी मौजूद मिलते। बाद में हिंदू कालेज के प्रोफेसर बने दीपक सिन्हा जी की कुछ साल पहले कैंसर से मौत हो गई। अजय चौधरी भी इस दुनिया में नहीं रहे।

शुरुआती दिनों के कई साथी अब हमें छोड़ कर जा चुके हैं। खबर मिली राजीव कटारा जी की कोरोना से मौत हो गई। मन बड़ा व्यथित है।


आलोक पराड़कर-

राजीव कटारा के विचार मेरा निर्माण करते रहे

समान पेशे में होने के बावजूद राजीव कटारा जी से मेरी कभी भेंट नहीं हो सकी। लेकिन लेखक-पत्रकार से भेंट का एक जरिया और होता है जो उसके लेखन से होकर गुजरता है। कटारा जी से इस प्रकार मेरी अक्सर मुलाकात उनकी रचनाओं के माध्यम से होती रही। कुछ मुलाकातें आप पर गहरा असर छोड़ती हैं, आपकी स्मृतियों में दर्ज हो जाती है।

अक्सर सुबह सवेरे उन्हें पढ़़कर जो ऊर्जा मिलती वह किसी प्रेरक व्यक्तित्व के स्नेहिल भेंट जैसी यादगार ही होती थी। कह सकता हूं कि उनकी टिप्पणियों ने मुझे सकारात्मक बनाया, मेरे अंतर्विरोध और उलझनों में रास्ता सुझाया, उनके शब्दों और विचारों ने मेरा निर्माण किया। उनकी कई टिप्पणियां मुझे आज भी याद है।

मैं अपने कई मित्रों और रिश्तेदारों को अक्सर बहुत व्यस्त देखता था। मैं ऐसे बहुत सारे लोगों को जानता था जिनसे जब भी मिलने गया, उनके पास इत्मीनान से मेरे साथ बैठकर चाय पीने का वक्त नहीं होता। वे अक्सर कहीं आ-जा रहे होते। बोलते, अगली बार आपके साथ बैठकर थोड़ा वक्त बिताएंगे, आज तो बड़ी व्यस्तता है। घंटों फोन पर बात करते रहते, ऐसा लगता जैसे पूरी दुनिया वे ही संभाले हुए हैं। इसके उलट मेरे पास अपने मित्रों के लिए, किताबें पढ़ने, संगीत सुनने, फिल्म देखने, गंगा किनारे घाटों पर घुमने या जाड़ों में छत पर धूप में चटाई बिछाकर अक्सर वक्त रहा है। और ऐसा बेकारी-बेरोजगारी के दिनों में नहीं था, साथ-साथ थोड़ा बहुत अपना काम तो चलता ही रहा है लेकिन ऐसा कभी नहीं हुआ कि आप कई-कई दिनों तक व्यस्त रह जाएं।

ऐसे में इन व्यस्त लोगों को देखकर मन में उधेड़बुन भी चलती कि क्या सफल लोग वे हैं जो जीवन में हमेशा बहुत व्यस्त हैं और इस निकष के आधार पर खुद के बारे में क्या समझा जाना चाहिए? उन्हीं दिनों राजीव जी की एक टिप्पणी पढ़ी। शायद पांच-छह साल पहले की बात होगी। ‘हिन्दुस्तान’ में उनकी अक्सर ऐसी टिप्पणियां छपतीं, जीवन के विभिन्न पक्षों पर। यह टिप्पणी ‘नकारा व्यस्तता’ पर थी। उन्होंने लिखा, ‘हम आज ऐसे दौर में हैं, जब भागमभाग हमारी जिंदगी का हिस्सा हो गई है। सचमुच भागमभाग हमारी जिंदगी पर हावी है। लेकिन कभी-कभी लगता है कि उसे कहीं जबरदस्ती तो हमने अपने ऊपर नहीं लाद लिया। वह हमारी जिंदगी का हिस्सा हो, तो ठीक है। कुछ के लिए वह हो भी सकता है। लेकिन बहुत सारे लोगों ने तो उसे लाद ही लिया है। उनके लिए वह स्ट्रैटेजी का हिस्सा हो गई है।

आज हमें कोई मिलता है और हमसे कहता है, ‘बिजी हो’, तो हमारे चेहरे पर नूर टपकने लगता है। व्यस्त होना अच्छी बात है। लेकिन उसकी एक्टिंग करना? उस हाल में हम काम कम करते हैं और इधर-उधर ज्यादा होते रहते हैं। कभी-कभी दूसरों को ठग रहे होते हैं और अक्सर अपने आपको। असल में इस अंदाज से हम काम करते हुए नजर ज्यादा आते हैं। लेकिन काम कम कर रहे होते हैं। आखिर हमारा मकसद क्या है? ज्यादा काम करना या दिखना? शायद सबसे ज्यादा जरूरी है बेहतर काम करना। अगर हम व्यस्त हैं, तो हैं। उसमें नाटक करने का क्या मतलब है? हमारी व्यस्तता से काम बेहतर होता है, तो कोई मतलब है। अगर बेहतरी नहीं होती, तो हम क्या हासिल कर रहे हैं?’

खुद के अनुभव से मैंने पाया कि जो लोग कभी बहुत व्यस्त दिखते थे, वे जीवन में फिर कहां खो गए पता नहीं चला। इनमें कुछ ऐसे भी थे जो इन व्यस्तताओं के दिनों के बाद अपने जीवन के उत्तरार्द्ध में जब कभी गंभीर रूप से कष्ट में हुए तो उनके इर्द-गिर्द कोई नहीं था। ऐसे तमाम लेख समय समय पर मुझे रास्ता दिखाते रहे। उनसे कभी भेंट न कर भी, उनकी उपस्थिति को लगातार महसूस करता रहा हूं और मेरी तरह उनके ढेरों पाठक भी महसूस करते रहेंगे जिनकी स्मृतियों में वे हमेशा जीवित रहेंगे!

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